Thursday, 19 December 2019

जिसने अपनी सारी जवानी घुसपैठियों को निकालने में लगा दी

क्या कह रहे हैं वह--ज़रा ध्यान से सुनिए 
Himanshu Kumar के फेसबुक वाल से साभार उन्होंने इसे आज ही 19 दिसंबर 2019 को 3:18 पर पोस्ट किया 
'एनआरसी हमारी बहुत बड़ी गलती है'
गुवाहाटी से दीपक असीम, संजय वर्मा
जिस आदमी ने अपनी सारी जवानी घुसपैठियों को निकालने में लगा दी
जिस आदमी ने अपनी सारी जवानी आसाम से घुसपैठियों को निकालने की मुहिम में लगा दी हो और अंत में वही निराश होकर कहे कि हमने एक पागलपन में जिंदगी बर्बाद कर दी तो इसे आप क्या कहेंगे? यह आदमी हैं मृणाल तालुकदार, जो आसाम के जाने-माने पत्रकार हैं और एनआरसी पर इनकी लिखी किताब 'पोस्ट कोलोनियल आसाम का विमोचन' चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने हफ्ता भर पहले दिल्ली में किया है।इनकी दूसरी किताब,जिसका नाम है - 'एनआरसी का खेल' कुछ दिनों बाद आने वाली है।वह एनआरसी मामले में केंद्र सरकार को सलाह देने वाली कमेटी में भी नामित हैं।वे आल असम स्टूडेंट यूनियन (आसु) से जुड़े रहे। दस्तक के लिए उनसे लंबी और बहुत खुली चर्चा हुई।
उन्होंने कहा मेरी और मेरे जैसे हजारों लोगों की जवानी आसाम से घुसपैठियों को निकालने कि आंदोलन की भेंट चढ़ गई।हममें जोश था मगर होश नहीं था।पता नहीं था कि हम जिनको आसाम से बाहर निकालने के लिए आंदोलन कर रहे हैं उन्हें किस तरह पहचाना जाएगा और उन्हें बाहर करने की प्रक्रिया क्या होगी।1979 में हमारा आंदोलन शुरू हुआ और 1985 में हम ही आसाम की सरकार थे।प्रफुल्ल महंत हॉस्टल में रहते थे हॉस्टल से सीधे सीएम हाउस में रहने पहुंचे। 5 साल कैसे गुजर गए हमें पता ही नहीं चला।राजीव गांधी ने सही किया कि हमें चुनाव लड़ा कर सत्ता दिलवाई।सत्ता पाकर हमें एहसास हुआ कि सरकार के काम और मजबूरियां क्या होती हैं। अगला चुनाव हम हारे मगर 5 साल बाद फिर सत्ता में आए। इन दूसरे 5 सालों में भी हमें समझ नहीं आया कि बांग्लादेशियों को पहचानने की प्रक्रिया हो। लोग हमसे और हम अपने आप से निराश थे।मगर घुसपैठियों के खिलाफ हमारी मुहिम जारी थी। बहुत बाद में हमें इसकी प्रक्रिया सुझाई भारत के होम सेक्रेटरी रहे गोपाल कृष्ण पिल्लई ने।उन्होंने हमें समझाया कि आप सब की नागरिकता चेक कराओ। अपने आप की भी नागरिकता चेक कराओ और जो रह जाएं वह बाहरी।
मृणाल तालुकदार 
चोर को पकड़ने के लिए क्लास रूम में सभी की तलाशी लेने वाला यह आइडिया हमें खूब जँचा मगर तब नहीं मालूम था कि सवा तीन करोड़ लोग जब कागजों के लिए परेशान इधर-उधर भागेंगे तब क्या होगा? बाद में रंजन गोगोई ने कानूनी मदद की और खुद इसमें रुचि ली। इसमें आसाम के एक शख्स प्रदीप भुइँया की खास भूमिका रही। वे स्कूल के प्रिंसिपल हैं उन्होंने ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की और अपनी जेब से 60 लाख खर्च किए।बाद में उन्हीं की याचिका पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट एनआरसी के आदेश दिए एक और शख्स अभिजीत शर्मा ने भी एनआरसी के ड्राफ्ट को जारी कराने के लिए खूब भागदौड़ की।तो इस तरह एनआरसी वजूद में आया और वजूद में आते ही हम सब सोचने लगे कि यह हमने क्या कर डाला?
खुद हमारे घर के लोगों के नाम गलत हो गए।सोचिए कैसी बात है कि जो लोग घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए आंदोलन कर रहे हैं उन्हीं के घर वालों के नाम एनआरसी की लिस्ट में नहीं आएं? बहरहाल यह गलतियां बाद में दूर हुईं।
जानेमाने गांधीवादी समाजसेवी हिमांशु कुमार 
बयालीस हज़ार कर्मचारी 4 साल तक करोड़ों कागजों को जमा करते रहे और उनका वेरिफिकेशन चलता रहा।आसाम जैसे पागल हो गया था।एक एक कागज की पुष्टि के लिए दूसरे राज्य तक दौड़ लगानी पड़ती थी। जैसे किसी के दादा 1971 के पहले राजस्थान के किसी स्कूल में पढ़े तो उसे दादा का स्कूल सर्टिफिकेट लेने के लिए कई बार राजस्थान जाना पड़ा।लोगों ने लाखों रुपया खर्च किया। सैकड़ों लोगों ने दबाव में आत्महत्या कर ली।कितने ही लाइनों में लगकर मर ।कितनों को ही इस दबाव में अटैक आया दूसरी बीमारियां हुई। मैं कह नहीं सकता कि हमने अपने लोगों को कितनी तकलीफ दी। और फिर अंत में हासिल क्या हुआ? पहले चालीस लोग एनआरसी में नहीं आए। अब19 लाख लोग नहीं आ रहे हैं। चलिए मैं कहता हूं अंत में पांच लाख या तीन लाख लोग जाएंगे तो हम उनका क्या करेंगे? हमने यह सब पहले से नहीं सोचा था। हमें नहीं पता था कि यह समस्या इतनी ज्यादा मानवीय पहलुओं से जुड़ी हुई है। मुझे लगता है की हम इतने लोगों को ना वापस बांग्लादेश भेज सकेंगे न जेल में रख सकेंगे और ना ही इतने लोगों को ब्रह्मपुत्र में फेंका जा सकता है। तो अंत में यह निर्णय निकलेगा की वर्क परमिट दिया जाए और एनआरसी से पीछा छुड़ा लिया जाए। केंद्र सरकार दूसरे राज्यों में एनआरसी लाने की बात कर रही है लेकिन उसे आसाम का अनुभव हो चुका है।

Monday, 2 September 2019

आज के दौर में माल रोड से गुज़रते हुुुए...

जनता का दुख भूल चुके हैं, अपना रौब जमाते हैं।
पत्रकार भी देखो अब अपनी तस्वीर छपाते हैं।

जैसा इनके आका बोलें, वैसा पोज़ बनाते हैं।
कठपुतली की तरह वो इनसे नाच रोज़ नचवाते हैं।

कहते हैं बस एक ही भाषा, उसका दिवस मनाएंगे हम,
फिर भाषा के नाम पे देखो, ये नफरत फैलाते हैं।

इन चिंगारियों से ही था पंजाब जला यह भूल गए,
न जाने फिर उसी तरह की आग यह क्यों भड़काते हैं।

जब हिंदी पर पुती थी कालिख, तब न जाने कहां थे ये?
अब हिंदी के नाम पे देखो अपने नोट भुनाते हैं।

पत्रकारों पर भी देखो नेतागिरी का भूत चढ़ा,
बड़ी बड़ी तसवीरें अपनी, बैनर पर लगवाते हैं।

धर्म कलम का याद नही, बस मेकअप करते रहते हैं,
तरह तरह के पोज़ बना कर मॉडल से इतराते हैं।

गोद में बैठें, दौड़ लगी है, गोदी मीडिया का यह युग,
मैं भी चमचा, में भी चमचा, ज़ोर से यह चिल्लाते हैं।

पत्रकार का दायरा कितना बड़ा है, इनको पता नहीं,
अपने हाथों कूंए बना कर उनमें गिरते जाते हैं।

हर भाषा सम्मानजनक है, आओ यह संकल्प करें,
भाषा के जो नाम पर झगड़ें, वे सब मिटते जाते हैं।

संकट बहुत गंभीर खड़े हैं, आओ उनकी बात करें,
वो दुश्मन हैं जो संकट की बात भुलाते जाते हैं।

                          --रेक्टर कथूरिया,
                               लुधियाना

Thursday, 18 April 2019

आरएसएस का असली सच:

"आपका ध्‍यान किधर है? असली टुकड़े-टुकड़े गैंग इधर है"
 Abhishek Srivastava  Posted on April 15, 2019:लोकवाणी 
मुझे नहीं पता कि किसकी सबसे ज्‍यादा सीटें आएंगी। मैं नहीं जानता कौन सी पार्टी सरकार बनाएगी। मुझे ये भी नहीं पता कि मेरी लोकसभा में सीट कौन निकाल रहा है। इस चुनाव का मुझे ‘च’ भी नहीं समझ आ रहा क्‍योंकि लोग ‘’च्‍च्‍च्‍च’’ तक नहीं कर रहे। भयंकर सन्‍नाटा है टीवी और मोबाइल के बाहर की दुनिया में। मेरे पास किसी सवाल का जवाब नहीं है। केवल एक बात मैं तयशुदा तौर पर महसूस कर रहा हूं और काफी ठोकने बजाने के बाद अब कहने की स्थिति में हूं। इसे सनद रख लें। बाद में काम आएगी।
यह चुनाव न भाजपा के लिए निर्णायक है, न कांग्रेस के लिए और न ही किसी दूसरे दल के लिए। यह चुनाव जनता के लिए भी निर्णायक नहीं है, न ही देश के लिए। यह चुनाव केवल और केवल राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के लिए निर्णायक है। जीत किसी की भी हो, यह चुनाव ‘’सांस्‍कृतिक संगठन’’ आरएसएस के ताबूत में आखिरी कील साबित होने जा रहा है। जिसे पैराडाइम शिफ्ट कहते हैं, उसका गवाह बन रहा है ये चुनाव। मुहावरा पलट गया है- कभी कहते थे कि बिना संघ के भाजपा कुछ नहीं है, आज की हकीकत ये है कि भाजपा है तो संघ है। संघ ने पूरी तरह भारतीय जनता पार्टी के धनबल और नेतृत्‍व-प्रभाव के सामने आत्‍मसमर्पण कर दिया है। ऐसा अनजाने नहीं हुआ, संघ के शीर्ष स्‍तर पर स्‍वेच्‍छा से लिया गया सचेतन निर्णय है।
भाजपा ने अपना खज़ाना खोल दिया है। संघ के काडरों का मुंह खुला हुआ है। साइकिल से चलने वाला प्रचारक फॉर्चूनर पर आ गया है। सांसद प्रत्‍याशी के इर्द-गिर्द घूम रहा है। सुविधाभोगी हो गया है। झण्‍डेवालान परिसर में जाकर देखिए समझ आ जाएगा, संघ के मुंह में पैसे का खून लग चुका है। अब वह परदे के पीछे काम करने वाला सांस्‍कृतिक संगठन नहीं रह गया है। आज का प्रचारक सामने खुलकर, आरएसएस लिखी टीशर्ट पहनकर, देसी चेग्‍वारा बना फिर रहा है। उसे समझ में आ चुका है कि बिना उत्‍पादन किए जिंदगी कैसे हरामखोरी से काटी जाती है। अब यह सिलसिला रुकने वाला नहीं। यह संघ को ले डूबेगा।
आप अपने क्षेत्र की शाखाओं और प्रचारकों के साथ एकाध भाजपा उम्‍मीदवारों के प्रचार में टहल आइए, आपका नतीजा इससे उलट नहीं होगा। 2014 के बाद सत्‍ता की राजनीति और मातृ संगठन की विचारधारा के बीच जो टकराव शुरू हुआ था, वह अब मुकम्‍मल हो चुका है। अब संघ का काडर पेड प्रचारक है। इसका असली परिणाम देखना हो तो 2022 तक दम थामे रखिए। अब तक भाजपा वाले कांग्रेस में जाते दिखे हैं, कल संघ का प्रचारक वहां जाएगा जहां उसकी सही कीमत लगेगी। एबसर्ड के थिएटर में केवल एक विचारधारा खतरे में नहीं होती, सभी होती हैं। सामाजिक निष्‍ठा का लोप सारे वैचारिक संगठनों को ले डूबता है। संघ अपवाद नहीं होना चाहिए।
सवाल उठता है कि फिर हिंदू राष्‍ट्र बनाएगा कौन? मेरे खयाल से कोई नहीं। जिस तरह सीपीआई, सीपीएम, माले सर्वहारा की तानाशाही स्‍थापित नहीं कर सकते ठीक उसी तरह भाजपा हिंदू राष्‍ट्र नहीं बना सकती। फिर सवाल उठता है भाजपा क्‍या बनाएगी? याद रहे, भाजपा का जन्‍म तोड़ने से हुआ है। उसकी पैदाइश में ही विध्‍वंस है। उसे कुछ भी बनाना नहीं आता। बनाने का आर्गुमेंट ही उसे नहीं आता है। इसलिए विकृत और पथच्‍युत संघ वाली भाजपा केवल तोड़ेगी। जितना तोड़ा है, उससे ज्‍यादा और तेजी से तोड़ेगी। आपका ध्‍यान किधर है? असली टुकड़े-टुकड़े गैंग इधर है।
आरएसएस पर एक दूसरा नज़रिया यह भी
लेकिन अभिषेक श्रीवास्तव के इस विश्लेषण से विनय सुल्तान सहमत नहीं दीखते। सुल्तान लिखते हैं, संघ यह समझता है कि ‘हिन्दू’ राजनीतिक पहचान के तौर पर जितना मजबूत होगा, उसकी जड़े उतनी ही गहरी होंगी।
पिछले पांच साल में संघ ने अपने काम करने के तरीके को बदला है। 
पहले होता यह था कि आप शाखा जाते थे। संघ शिक्षा वर्ग में शामिल होते थे। फिर आपको अनुषांगिक संगठनों की जिम्मेदारी दे दी जाती थी। अब ऐसा नहीं है। अब चाहे आप शाखा जाते हो या नहीं, आपने संघ शिक्षा वर्ग किया है या नहीं आपको अनुषांगिक संगठनों की जिम्मेदारी मिल रही है।
एक मोहल्ले में संघ ने 14 अलग-अलग संगठन खड़े किए हैं। इसमें गौ रक्षा, लव जिहाद नियंत्रण जैसे संगठन हैं। ये आपको जमीन पर बहुत सक्रिय नहीं दिखाई देते। संघ की शाखाओं में भी संख्या घट रही है। लेकिन लोगों के बीच संघ की घुसपैठ बढ़ी है। यह काम बहुत सधे हुए ढंग से चल रहा है।
दूसरा ऑनलाइन माध्यमों की वजह से प्रचार का व्याकरण भी बदला है। यह पहले से ज्यादा टार्गेटेड है। सटीक है। हम और आप इसके लक्षित समूह नहीं है, इस वजह से इसके फैलाव से भी बेखबर हैं। हिंदुत्व का जो मास हिस्टीरिया 2014 में खड़ा होना शुरू हुआ था वो अब मोदी के नियंत्रण से बाहर है। संघ जब चाहे तब मोदी को हिन्दू विरोधी साबित करके किनारे लगा सकता है। 2004 में अटल के साथ वो यह कर चुका है। उस समय संघ की प्रचार मशीन ने अंदर ही अंदर अटल को गाय की जीभ खाने वाला साबित कर दिया था।
संघ अब भी सत्ता का केंद्र है। जिस दिन नरेंद्र मोदी की उपयोगिता खत्म होगी, मार्गदर्शक मंडल में उनके लिए सीट खाली कर दी जाएगी। (लोकवाणी से साभार)

Monday, 29 January 2018

पीपुल्ज़ मीडिया की विशेष बैठक 30 जनवरी को लुधियाना में

मीडिया की मौजूदा स्थिति और समस्याओं पर होगा विशेष विचार 
लुधियाना29 जनवरी 2018: (जन मीडिया मंच)::
मीडिया में निरंतर सख्त मेहनत करने के बावजूद मीडिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा शोषण का शिकार है। डयूटी के समय और वेतन को लेकर इन पत्रकारों से अन्याय निरंतर जारी है। उनके लिए आवाज़ उठाना भी आसान नहीं क्यूंकि बड़े बड़े पत्रकार संगठन उनको शर्तों पर अपना सदस्य बनाते हैं और अन्य ट्रेड यूनियन उनकी समस्यायों को उठाने में सरगर्मी नहीं दिखा सकीं। इसी बीच कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं जिनमें समझौते की राह पकड़ने को मजबूर होना पड़ा। 
इस नाज़ुक हालात ने बहुत से सवाल खड़े किये हैं। आखिर क्या किया जाये? इस पर आपके सुझाव हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस स्थिति को ले कर 
"पीपुल्ज़ मीडिया लिंक" की एक आवश्यक बैठक 30 जनवरी 2018 दिन मंगलवार को सुबह 10:45 पर भाई बाला चौंक, लुधियाना पर स्थित शहीद करतार सिंह सराभा पार्क में होगी। इस अवसर पर जन अधिकारों और जन समस्यायों के साथ एकजुटता दर्शाने के साथ साथ मीडिया जगत की मौजूदा स्थितियों पर भी चर्चा होगी और इस के लिए आवश्यक संघर्ष की रणनीति पर भी विचार होगा।  
                                                                          ---सम्पर्क: रेक्टर कथूरिया (9915322407) 

Monday, 8 January 2018

जन मीडिया मंच ने भी की रचना खैरा पर FIR की सख्त निंदा

इस FIR से सिस्टम के नापाक इरादे फिर बेनकाब हुए हैं 
लुधियाना: 7 जनवरी 2017: (जन मीडिया मंच)::
टविटर पर रचना खैरा का टवीट 
खोखला और जन विरोधी सिस्टम बेनक़ाब होता जा रहा है और सिस्टम को चलाने वाले बेशर्म तानाशाह  बनते जा रहे हैं। द ट्रिब्यून की पत्रकार रचना खेहरा के खिलाफ FIR ने एक बार फिर यही साबित किया है। "जन मीडिया मंच" इस FIR की सख्त निंदा करता है और इसके खिलाफ संघर्ष में एकजुट हुए संगठनों के साथ है। गौरतलब है कि UIDAI के डिप्टी डायरेक्टर ने ट्रिब्यून और उसकी रिपोर्टर रचना खैरा के खिलाफ FIR दर्ज करवाई है। रचना का कसूर बस इतना ही कि उसने अपनी एक रिपोर्ट में इस जन विरोधी और भ्रष्ट सिस्टम को बेनकाब किया है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि एक गिरोह लोगों के आधार से जुड़ी हर निजी जानकारी मात्र 500/- रुपए में लोगों को मुहैया करवाता है। आधार और इसकी गोपनीयता पर दमगजे मारने वाले सिस्टम को हकीकत का इस तरह बाहर आना गवारा नहीं हुआ। लोगों की निजी ज़िंदगी के व्यक्तिगत स्टाईल को  तमाशा बना देने वाला यह सिस्टम अब पत्रकार रचना खैरा को कहर भरी नज़रों से देख रहा है। 

एक प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक के मुताबिक इस FIR में अनिल कुमार, सुनील कुमार और राज का नाम भी शामिल है। उल्लेखनीय है कि खैरा ने ट्रिब्यून के लिए रिपोर्ट तैयार करते हुए इन्हीं लोगों से संपर्क किया था। 
इसी बीच क्राइम ब्रांच के संयुक्त आयुक्त आलोक कुमार ने एक ऍंग्रेज़ी दैनिक को बताया कि इस मामले में FIR दर्ज कर ली गई है और शुरुआती जांच भी शुरू हो गई है। यह FIR क्राइम ब्रांच की साइबर सेल द्धारा IPC की धारा 419, 420, 468 और 471 साथ ही IT एक्ट की धारा 66 और आधार एक्ट की धारा 36/37 के अंतर्गत FIR दर्ज की गई है। बड़े बड़े मामलों में कई कई वर्षों तक हरकत में न आने वाला सिस्टम इस मुद्दे पर बहुत तेज़ी से हरकत मैं आया है। यह पोल खुलने की बौखलाहट ही कही जा सकती है।मौजूदा सिस्टम को हिला देने वाली इस रिपोर्ट ने इस सिस्टम का बहुत कुछ बेनकाब जो कर दिया है। 
गौरतलब है कि इससे पहले UIDAI ने इस प्रकार की किसी भी जानकारी के लीक होने की खबरों को खारिज किया था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अब यह चौथी बार है जब UIDAI ने इस प्रकार की कार्रवाई की है। सबसे पहले समीर कोचर, देबयान रॉय (सीएनएन-न्यूज़18) और सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसाइटी पर भी UIDAI FIR करवा चुका है। जन मीडिया से जुडी हर बात इस सिस्टम को नागवार लगती है। 


आखिर ट्रिब्यून का कसूर क्या है? क्या किया है रचना खैरा ने? क्या था ट्रिब्यून की इस खबर में? कुछ संक्षिप्त सी चर्चा करते हैं इस रिपोर्ट की। द ट्रिब्यून की खबर में कहा गया था कि अगर आपको आधार डेटा चाहिए तो बस पेटीएम के माध्यम से 500/- रुपए देना होगा और 10 मिनट के अंदर आपको सारी जानकारी मिल जाएगी। इस खोजपूर्ण खबर के मुताबिक, एक ऐसा रैकेट है जो कि गेटवे नाम के माध्यम से आपको लॉग इन और पासवर्ड देग। इसके बाद आप किसी का भी आधार नंबर उसमें डालिए आपको उस नंबर पर उपलब्ध सारी जानकारियां मिल जाएगी। पिन कोड से लेकर मोबाइल नंबर और आपकी मेल आईडी तक। इसके बदले में आपको इसकी कीमत चुकानी होगी सिर्फ 500 रुपए।  इस तरह 500/- रुपयों के एक नॉट के बदले में कितने लोगों की व्यक्तिगत जानकारी चुराई जा चुकी होगी इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। देश की सुरक्षा से जुड़े लोगों की जानकारी में कितने लोग सेंध लगा चुके होंगें इसका अनुमान भी कठिन होगा। 
रिपोर्ट बताते है कि यह रैकेट इतना संगठित तरीके से काम करता है कि आपको ये सिर्फ जानकारी ही नहीं देंगे बल्कि अगर आप किसी का भी आधार प्रिंट कराकर रखना चाहते हैं तो उसकी भी व्यवस्था कर रखी है इन लोगों ने। इस मकसद के लिए आपको 300/- और रुपए देने होंगे जिससे इस रैकेट के लोग आपको एक ऐसा सॉफ्टवेयर मुहैया कराएंगे जिसके जरिए आप आधार का प्रिंट भी निकाल सकते हैं। इन बातों से ये तो साफ हो गया होगा कि आपका आधार कितना सुरक्षित है।  डिजिटल इण्डिया और जो ग्रीन के बहाने से तरह तरह के तजुर्बे करने वाला यह सिस्टम किस तरह आपकी ज़िंदगी में तांकझांक करके खलल दाल सकता है शायद अभी इसका अनुमान न लगाया जा सके। 

Saturday, 6 January 2018

लुधियाना में धरना प्रदर्शनों पर लगाई रोक के खिलाफ़ भारी रोष

Sat, Jan 6, 2018 at 4:55 PM
जनवादी जनसंगठनों ने की विशेष बैठक 
रोक तुरन्त वापिस न लेने पर तीखे संघर्ष का ऐलान


लुधियाना: 6 जनवरी, 2018: (जन मीडिया मंच ब्यूरो)::
लोगों के अधिकारपूर्ण संघर्षों को कुचलने की साजिश तहत पुलिस कमिश्नरेट, लुधियाना के एरिया में डी.सी. लुधियाना के आदेशों पर पुलिस कमिश्नर लुधायना द्वारा धारा 144 लगाकर धरना-प्रदर्शनों पर रोक लगाने के खिलाफ़ जिले के बड़ी संख्या इंसाफपसंद जनवादी-जनसंगठनों ने आज मीटिंग करके सख्त निन्दा करते हुए इन आदेशों को वापिस लेने की माँग की है। संगठनों ने फैसला किया है कि 9 जनवरी को डी.सी. लुधियाना को संगठनों का प्रतिनिधि मण्डल मिलकर अपना पक्ष रखेगा और इन आदेशों को वापिस लेने की माँग करेगा। अगर ये आदेश वापिस न हुए तो इस खिलाफ़ तीखा संघर्ष करने का ऐलान भी किया गया। आज की यह बैठक बीबी अमर कौर यादगारी हाल में हुई जिसका संचालन शहीद भगत सिंह जी के भान्जे प्रोफेसर जगमोहन सिंह करते हैं। 
संगठनों का कहना है कि धरना-प्रदर्शनों के लिए सिर्फ एक स्थान तय कर देना किसी भी प्रकार जायज नहीं है बल्कि इसके पीछे जनआवाज़ कुचलने की हाकिमों की साजिश है। हालांकि यह रोक सरकारी कामकाज बेरोक चलाने, लोगों की सहूलत, अमन-कानून की विवस्था बनाए रखने के बहाने लगाई गई है। लेकिन वास्तविक निशाना अधिकार माँग रहे लोग हैं। संगठनों का कहना है कि यह रोक किसी भी प्रकार मानने योग्य नहीं है। धारा 144 लगाना संगठित होने, संघर्ष करने के बुनियादी जनवादी अधिकार पर हमला है। संगठनों का कहना है कि ऐसे आदेशों से जनसंघर्ष रुकने नहीं वाले बल्कि और तीखे ही होंगे। केन्द्रीय और राज्य स्तरों पर हुक्मरानों द्वारा धड़ा-धड़ काले कानून बनाए जा रहे हैं। पंजाब में भी जनसंघर्षों को दबाने की साजिश तले पंजाब सार्वजनिक व निजी जायदाद नुकसान रोकथाम कानून लागू कर दिया गया है और गुण्डागर्दी रोकने के बहाने नया काला कानून पकोका बी बनाने की तैयारी है। डिप्टी कमिश्नर और पुलिस कमिश्रर लुधियाना द्वारा जारी हुए हुक्म भी इसी दमनकारी प्रक्रिया का अंग हैं। 

संगठनों का कहना है कि अपनी समस्याएँ हल न होने पर लोगों को मज़बूरीवश विभिन्न सरकारी अधिकारियों के दफतरों, संसद-विधानसभा मैंम्बर, मेयर, काऊँसलर, थाना, चौंकी, सड़कों आदि पर प्रदर्शन करने पड़ते हैं। हकों के लिए इक्कठे होना और आवाज़ बुलन्द करना लोगों का जनवादी ही नहीं बल्कि संविधानिक हक भी है। भारतीय संविधान की धारा 19 के तहत लोगों को अपने विचारों और हकों के लिए संगठित होने वा संघर्ष करने की आज़ादी है। यह हुक्म लोगों के संवेधानिक व जनवादी अधिकार का हनन है।
आज की मीटिंग में जमहूरी अधिकार सभा के प्रो. जगमोहन सिंह, कारखाना मज़दूर यूनियन के लखविन्दर, पंजाब खेत मज़दूर सभा के गुलजार सिंह गोरिया, तर्कशील सोसाइटी के जसवंत जीरख, मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान के सुरिन्दर सिंह, इंकलाबी केन्द पंजाब के कंवलजीत खन्ना, सी.आई.टी.यू. के जगदीश चन्द, मोल्डर एण्ड स्टील वर्कर्ज यूनियन के का. जोहरी, टेक्सटाईल हौज़री कामगार यूनियन के राजविन्दर, आर.पी.एफ. के अवतार सिंह विर्क, पेंडू मज़दूर यूनियन (मशाल) के सुखदेव भूँदड़ी, कामागाटा मारू यादगारी कमेटी के जागर सिंह बद्दोवाल, जे.सी.टी.यू. के चमकौर सिंह, एटक के गुरनाम सिद्धु, मेडीकल प्रेक्टीशनर ऐसोसिएशन के सुरजीत सिंह, नौजवान भारत सभा की बिन्नी, आजाद निर्माण मज़दूर यूनियन के हरी सिंह साहनी, पीपलज मीडिया के रेक्टर कथूरिया, पंजाब सक्रीन की कार्तिका आदि शामिल थे। 

Monday, 24 April 2017

निगम कर्मचारियों ने भी की ठेकेदारी प्रथा समाप्त करने की मांग

वेतन हर महीने की पहली तारीख को मिलना सुनिश्चित हो 
लुधियाना: 23 अप्रैल 2017: (ओंकार सिंह पूरी//जन मीडिया मंच):: 

मानवता के लिए उषा की किरण जगाने वाले हम,
शोषित, पीडित, दलित जनों का भाग्य बनाने वाले हम।
हम अपने श्रम सीकर से ऊसर में स्वर्ण उगा देंगे,
कंकड पत्थर समतल कर कांटों में फूल खिला देंगे। 

इस गीत के सुरीले बोल छावनी मौहल्ला में स्थित आर्य स्कूल की दीवारों से छन छन कर बाहर आ रहे थे। शब्दों में जान थी। अंदर जा कर देखा तो मज़दूरों का सम्मेलन चल रहा था। नगर निगम के जो कर्मचारी लुधियाना जैसे बड़े शहर को साफ़ सुथरा रखने के लिए दिन रात मेहनत करते हैं उनका वार्षिक अधिवेशन चल रहा था। म्यूनिसिपल वर्करज यूनियन के सदस्य और अन्य लोग पूरे ध्यान से मंच से आ रही आवाज़ को सुन रहे थे। गीत के बाद मंच से बताया गया कि भारतीय मज़दूर संघ इस समय देश का सबसे बड़ा ट्रेड यूनियन संगठन बन चुका है। यह कोई पार्टी आयोजन नहीं बल्कि मज़दूर की भलाई के कानूनों को पढ़ने वाली कक्षा लग रही थी। एक एक बारीकी को बताया जा रहा था और समझा भी जा रहा था। मज़दूर की शक्ति क्या कुछ कर सकती है इनकी झलक इनके इरादों से देखी जा सकती थी। इनका आत्म विश्वास इनके चेहरों से साफ़ झलक रहा था। मेहनत की कमाई का नूर इनकी आँखों की चमक से नज़र आ रहा था। 
इस अधिवेशन में जहाँ संगठन के भविष्य में अपनाई जाने वाली रणनीति की चर्चा की जा रही थी वहीँ इस समय सामने खड़ी मांगों की भी चर्चा की गयी। केवल चर्चा ही नहीं इनको ज़ोरदार ढंग से उठाया भी गया। 
इस कार्यक्रम के मुख्य मेहमान करतार सिंह राठौर ने मीडिया से एक भेंट में बताया कि इस सरकार के दौर में भी अभी तक वही हो रहा है जो कांग्रेस सरकार के समय होता रहा है। यह सर्कार भी उन्ही पद चिन्हों पर चल रही है। संगठन ने मांग की कि शहर की बढ़ती हुई आबादी के हिसाब से बी एंड आर और बागबानी शाखा  में कर्मचारियों की नयी भर्ती की जाये। केंद्रीय कर्मचारियों की तरह वेतन आयोग की रिपोर्ट पंजाब सर्कार के कर्मचारियों पर भी लागू की जाये।  सेवा मुक्त और मृतक कर्मचारियों को उनका बकाया जल्द से जल्द किया जाये। निगम में गाड़ी चला रहे कर्मचारियों को ड्राईवर के तौर पर प्रमोट किया जाये। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की तनख्वाह के भुगतान हर महीने की पहली तारीख को सुनिश्चित किया जाये। इसके साथ ही मांग की गयी ठेकेदारी प्रथा को समाप्त किया जाये। कर्मचारियों को यूनिफार्म बी समय पर दी जाये। साथ ही कैशलेस स्कीम को भी जल्द से जल्द लागू किया जाये। 
इस मौके पर विशेष तौर से शामिल हुईं वरिष्ठ डिप्टी मेयर सुनीता अग्रवाल ने मीडिया से एक भेंट में कहा कि हमारी नगर निगम के इन कर्मचारियों की मांगें भी बहुत छोटी छोटी हैं। हम पूरा प्रयास करते हैं की इन मांगों को जल्द से जल्द मान लिया जाये।  अगर फिर भी कोई दिक्क्त हो तो ये लोग कभी भी मुझे आ कर मिल सकते हैं। भारतीय मज़दूर संघ के कई अन्य सक्रिय कार्यकर्ता भी यहाँ मौजूद थे। कुल मिलकर यह एक सफल आयोजन था। इसका नारा था--देश के हित में करेंगे काम, काम के लेंगे पूरे दाम !