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Monday, 2 September 2019

आज के दौर में माल रोड से गुज़रते हुुुए...

जनता का दुख भूल चुके हैं, अपना रौब जमाते हैं।
पत्रकार भी देखो अब अपनी तस्वीर छपाते हैं।

जैसा इनके आका बोलें, वैसा पोज़ बनाते हैं।
कठपुतली की तरह वो इनसे नाच रोज़ नचवाते हैं।

कहते हैं बस एक ही भाषा, उसका दिवस मनाएंगे हम,
फिर भाषा के नाम पे देखो, ये नफरत फैलाते हैं।

इन चिंगारियों से ही था पंजाब जला यह भूल गए,
न जाने फिर उसी तरह की आग यह क्यों भड़काते हैं।

जब हिंदी पर पुती थी कालिख, तब न जाने कहां थे ये?
अब हिंदी के नाम पे देखो अपने नोट भुनाते हैं।

पत्रकारों पर भी देखो नेतागिरी का भूत चढ़ा,
बड़ी बड़ी तसवीरें अपनी, बैनर पर लगवाते हैं।

धर्म कलम का याद नही, बस मेकअप करते रहते हैं,
तरह तरह के पोज़ बना कर मॉडल से इतराते हैं।

गोद में बैठें, दौड़ लगी है, गोदी मीडिया का यह युग,
मैं भी चमचा, में भी चमचा, ज़ोर से यह चिल्लाते हैं।

पत्रकार का दायरा कितना बड़ा है, इनको पता नहीं,
अपने हाथों कूंए बना कर उनमें गिरते जाते हैं।

हर भाषा सम्मानजनक है, आओ यह संकल्प करें,
भाषा के जो नाम पर झगड़ें, वे सब मिटते जाते हैं।

संकट बहुत गंभीर खड़े हैं, आओ उनकी बात करें,
वो दुश्मन हैं जो संकट की बात भुलाते जाते हैं।

                          --रेक्टर कथूरिया,
                               लुधियाना

Friday, 28 August 2015

दरिंदगी का शिकार हुई दामिनी को समर्पित कविता//गगनदीप गुप्ता

क्योंकि एक बस चार दरिंदे लिये, शान से चलती गयी
Courtesy Photo
दिल्ली की वह दरिंदगी भरी वहशियाना वारदात याद आते ही आज भी आम जनमानस के दिलो-दिमाग में एक सिहरन सी दौड़ जाती है। सियासत की अपनी मजबूरियां हो सकती हैं।  कानून के हाथ नियमों से बंधे हो सकते हैं और पुलिस व प्रशासन की अपनी बेबसी हो सकती है। लगता है उसे भुलाया जा रहा है। जानबूझ कर हालात से आँखें मूंदी जा रही हैं।  अगर सबक सीखने वाली करवाई हुई होती तो उसकी मौत के बाद भी यह एह्र्मनाक सिलसिला जारी नहीं रहता। उसके आखिरी दिनों की कल्पना भी बहुत पीड़ा दायिक है।  उस दर्द को महसूस करते हुए कुछ पंक्तियाँ लिखीं हैं-गगनदीप गुप्ता ने। उन पंक्तियों को हम यहाँ ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहे हैं। आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार बानी रहेगी। 
आज फिर मेरी कलम चलने को तैयार हो गयी,
लगा उसकी आत्मा वहशीपन का शिकार हो गयी,
मानवता को डस लिया मानवता ने ऐसे,
खून की नलियाँ जैसे ज़हरीला बहाव हो गयीं।

इक मासूम, इक लड़की, तन्हा-ओ-बेबस,
बस इसलिये कर दी गयी,
क्योंकि एक बस चार दरिंदे लिये,
शान से चलती गयी।

न कहूँगा उन्हें जानवर,
कि जानवर तो जान वार देते हैं,
वो चार हैं वही वहशी दरिंदे,
जिन्हें हम समाज में पनाह देते हैं।

बहादुर करार दिया उस मासूम को,
कि वो अब तक मरी नहीं, जली नहीं,
ज़िंदा भी है अब तलक जो,
कि साँसें अभी रुकी नहीं।

इशारों में पुछती है माँ-बाप से,
क्या मिलेगा इंसाफ़ इस दर्द का?
क्या होगा ईलाज इस मर्ज़ का?
कि जागेगी आवाम इस पाप से।

कोख से जन्मे मेरी जो,
मेरा ही दामन दाग़दार कर दिया,
चंद हवस के पुतलों ने,
हर माँ को शर्मसार कर दिया।

सज़ा हो फाँसी या फिर,
नपुंसक हर उस शख़्स को बनाने की,
ज़रुरत है तो बस आज,
और मासूमों की लाज बचाने की।

क्यों न 'गगन' हो कुछ ऐसा कानून,
कि सहर जायें कब्रों के मुर्दे भी,
हर आरोपी का हश्र हो ऐसा,
निकाल दो आँखें, दिल और गुर्दे भी।

एक इल्तज़ाः
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वो जो एक मासूम जान,
लेटी मरणशया पर कराह रही है,
मेरी कलम क्या लिखे और,
सोचकर ही उसकी जान जा रही है।

दुआ है बस दोस्तो!
कर सको तो करो उसके लिये,
वरना तो जीना भी है मुश्किल,
इस जहाँ में खुदा के लिये।
दरिंदगी का शिकार हुई दामिनी को समर्पित कविता//गगनदीप गुप्ता