Sunday, 20 February 2022

पंजाब में आम जनता वंचित रही स्टेट ट्रांसपोर्ट की बसों से

पंजाब के हर डिपो से 50-50 फीसदी बसें इलेक्शन डियूटी पर लगा दीं 


लुधियाना
: 19 फरवरी 2022: (जन मीडिया मंच ब्यूरो):
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हम को जनता से क्या मतलब--वोटर जाएं भाड़ में! कुछ इसी तरह की भावना नेता लोगों की होती है चाहे वे किसी भी दल के क्यूं न हो। वे बस चुनावों के वक्त ही जनता को माईबाप कहने आते हैं लेकिन वास्तव में जनता को कभी कुछ नहीं समझते। इसी तरह का नज़ारा खरड़ के बस स्टैंड पर भी देखने को मिला। लोग घंटों से सड़कों पर बने हुए पंजाब के विभिन्न बस अड्डों पर भी खड़े थे लेकिन बसें नहीं आ रहीं थी। लुधियाना से जुड़े रूटों कुछ ज़्यादा ही बुरा हाल था।  लोग निजी बसों के कंडक्टरों की मिन्नतें कर रहे थे लेकिन वहां भी जगह नहीं थी। लोग छतों पर भी बैठे थे। खरड़ से लुधियाना जाने के लिए करीब पांच घंटे में केवल तीन सरकारी बसें इस बस स्टैन्ड से हो कर गुज़रीं। ये बसें भी चंडीगढ़//मोहाली इत्यादि पीछे से ही भर कर आईं थीं। दूसरी तरफ निजी कंपनियों की बसें धड़ाधड़ आ कर सवारियों को उठा रहीं थीं। सबसे ज़्यादा परेशानी हो रही थी महिला सवारियों को क्यूंकि राज्य सरकार की बसों में उनकी टिकट केवल आधार कार्ड दिखा कर मिल जाती हैं। लोग हैरान थे कि दस पंद्रह मिनटों की सर्विस के बाद आने वाली बसें आज कहाँ चलीं गईं। उन्हें ज़मीं निगल गई या आसमां खा गया। सवारियां एक दुसरे से पूछ रहीं थीं क्या आज इस रुट पर कोई हड़ताल है?

इस संबंध में पूछ-ताछ करने पर पता चला कि सरकार के कहने पर हर डीपू से 50 फीसदी बसें इलेक्शन डयूटी के लिए रवाना कर दी गईं  हैं।  लुधियाना की बसें पहले गिल गांव में एकत्र हुईं और उसके बाद उन्हें उनकी मंज़िलों की तरफ रवाना कर दिया गया। 

दूसरी तरफ अपनी अपनी मंज़िलों की तरफ अपने अपने काम के लिए जाने को मजबूर बेचारे आम लोग प्राइवेट बसों, वॉल्वो वाली महंगी बसों या फिर कैब/टेक्सी ले कर जाने को मजबूर हुए। जो यह सब एफोर्ड नहीं कर सके उन्हें बीएस स्टैंड पर देर तक धक्के खाने पड़े। इनमें से बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्होंने अपने अपने शहर जा कर अपना मतदान करना था लेकिन वे नहीं कर पाए। 

पंजाब के रूटों पर ये बसें इस लिए बेहद कम नज़र आईं क्यूंकि इन डिपुओं से 50-50 फीसदी बसें इलेक्शन डियूटी पर लगा दीं। इलेक्शन स्टाफ के लिए 19 और 20 फरवरी पूरे दो दिन ये सरकारी बसें आम जनता की निगाहों से दूर रहीं। लुधियाना डिपो से जुड़े रूटों पर हालत इस लिए यज़दा बिगड़ी क्यूंकि लुधियाना में न केवल एक डिपो है जबकि कुछ अन्य स्थानों पर तीन तीन डिपो भी हैं। मतदान के मौके पर भी आम जनता से सर्कार की ट्रांसपोर्ट सुविधा छीन लेने वाले लोग नई सुविधा क्या देंगें इसका अनुमान मुश्किल नहीं। 

Friday, 17 September 2021

किसान हितैषी होने का नाटक कर रहे हैं सुखबीर बादल-सरना

 17th September 2021 at 08:18 PM

सुखबीर बादल की नैया को डूबती हुई बताया हरविंदर सिंह सरना ने 

नई दिल्ली17 सितम्बर 2021: (मनप्रीत सिंह खालसा//जन मीडिया मंच)::

बादल पार्टी गुरुद्वारों के फंड को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए दुष्प्रयोग करना बंद करें। सुखबीर बादल एंड कंपनी को अपनी डूबती नैया दिख रही है। जिसको बचाने के लिए यह नेता किसान हितैषी होने का नाटक कर रहे है। उपयुक्त बातें, शिरोमणि अकाली दल दिल्ली के महासचिव और दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी के पूर्व प्रधान हरविंदर सिंह सरना ने कही। 

जानकारी हो कि, हरविंदर सिंह सरना ने अभी हाल ही में सम्पन्न डीएसजीएमसी चुनावों में मनजिंदर सिंह सिरसा को करारी शिकस्त दिया था। डीएसजीएमसी के नवनियुक्त सदस्य, सरना ने विरोधियों को आड़े हाथों लेते हुए यह बयान जारी करते हुए कहा कि "बादलों के प्रबंधन के नीचे लगातार सिख मर्यादाओं का उल्लंघन हो रहा है। केशगढ़ की घटना ने सबको झकझोर कर रख दिया है। जिसका जवाब संगत माँग रही है। एसजीपीसी और डीएसजीएमसी की हालात खस्ता है। भृष्टाचार चरम पर है। गुरूद्वारों के फंड को बादल अपने राजीतिक एजेंडे पर उड़ा रहे है। उनको किसान प्रदर्शन की आड़ में नाटक करने की जरूरत नही है। "

शिअद के महासचिव का मनना है कि सुखबीर बादल इन प्रदशर्न की आड़ में उनके खिलाफ लंबित गंभीर मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए कर रहे है। 

उन्होने कहा कि "एक समय था जब बड़े अकाली नेता सरदार हरचंद सिंह लोंगवाल के एक आह्वाहन पर, 265000 सिक्खो ने धर्म युद्ध मोर्चा में अपनी गिरफ्तारी दी थी। 1950 के दशक में, मास्टर तारा सिंह के आह्वाहन पर 50,000 से अधिक सिखो ने गिरफ्तारी दी थी। लेकिन आज अकाली का पवित्र नाम इन तथाकथित माफियाओं की वजह से धूमिल है। सिख पंथ को इन ढोंगियों की जरूरत नही है। हम अपना वर्तमान और भविष्य निर्धारित करने में पूर्ण सक्षम है।"

Wednesday, 9 September 2020

दमन रोको-आई एल ओ का बेलारूस को विशेष पत्र

Wednesday: 9th September 9 at 10:04 PM
 बेलारूस में चल रहे प्रदर्शनों के चलते हो रहा है वर्करों का दमन 
इस तस्वीर को क्लिक किया Natallia Rak ने
जेनेवा: 9 सितंबर 2020: (आई एल ओ न्यूज़//जन मीडिया मंच)::
इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाईजेशन के डायरेक्टर जनरल गुई राईडर (Guy Ryder) ने बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्सेंडर लुकाशेंको (Alexander Lukashenko) को लिखे एक पत्र में कहा है कि मानवाधिकारों के उलंघन को रोकें और वर्करों के लिए पूरा सम्मान सुनिश्चित करें। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि देश में वर्करों के रोष प्रदर्शनों की बाढ़ सी आई हुई है ऐसे में आवश्यक है कि उनकी स्वतंत्रता और उनके अधिकारों का विशेष ध्यान रखा जाये। अगर उनकी स्वतंत्रता और उनके अधिकारों का हनन होता है तो यह ठीक नहीं होगा। 
इस पत्र में उन्होंने छह ट्रेड यूनियनिस्टों पर लगाए गए आरोपों को वापिस लेने और उन्हें रिहा करने पर भी ज़ोर दिया है। यह लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन और इंडस्ट्रियल  शामिल हुए थे। 
उन्होंने अपने पत्र में राष्ट्रपति को याद दिलाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे वर्करों को हिंसा मुक्त माहौल देना  सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि वर्करों और प्रदर्शनकारियों पर कोई दबाव न डाला जाये और न ही उनको धमकियां दी जाएँ। अगर ऐसा कोई भी आरोप सामने आता है तो उसकी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच बिना किसी देरी के कराई जाये। 
गौरतलब है कि वर्करों के दमन की कई खबरें आई एल ओ को मिलीं थीं। 

Tuesday, 1 September 2020

मज़दूरों की तरफ पीठ करने वालों को भी मज़दूर याद रखेंगे

 वक़्त निकल जाने के बाद अब कौन से संघर्ष? 
गांव कुनेक्शन ने इस तस्वीर को स्क्रॉल  इन के हवाले से प्रकाशित किया है 
सब कुछ याद रखा जाएगा
ये उन मजदूरों के पांव है जो अपने बच्चों को गोदी में उठाएं सैकड़ों किलोमीटर पैदल चले। दूर दूर तक पैदल चले तांकि भूख से बचने के लिए अपने घर पहुंच सकें। वही गांव का घर जिसे वे लोग बरसों पहले छोड़  आये थे तांकि शहरों में जा  कमाई  कर सकें। अपने परिवारों पर चढ़े कर्ज़े उतार सकें। सड़कों पर घिसटते हुए यह वे लोग हैं जिन्हें संभालने की ज़िम्मेदारी सरकार भी पूरी न कर सकी इनके लीडर भी इनका साथ छोड़ गए। यह कहीं रेल से कट मरे और कहीं सड़क हादसों में लेकिन हर रोज़ इनके हाथ में झंडा पकड़ने वालों में से किसी ने इन्हें शहीद भी नहीं माना। 
अफ़सोस कि इनके साथ कंधा मिलाने के लिए वे लोग भी नहीं आये जो बरसों से नारे लगाते आ रहे हैं,"दुनिया भर के मज़दूरो एक हो जाओ।" 
अजीब इतफ़ाक़ है कि जब दुःख और संकट की घड़ी ने इन्हें एक हो कर सड़कों पर चलने को मजबूर कर दिया तो इनके रहनुमा कहलाने वाले लोग अपनी एयर कंडीशंड कोठियों में छुप गए कि कहीं कोरोना न देख ले। कहीं हमें कोरोना न डस ले।  मज़दूर शक्ति पर जिन लोगों को कभी नाज़ हुआ करता था उन्होंने यह भी न देखा कि अब मज़दूरों क्या हालत है? मज़दूरों को घर से बेघर हुआ देख कर भी इस तरफ से आंखें फेर ली गई। जिस वक़्त इंक़लाब को नज़दीक लाने का एक सुनहरी मौका दुश्मन  दिया था उस समय इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे बुलंद करने वाले खुद ही खामोश हो कर अपने अपने घरों में दुबक गए। 
इनके लीडरों से अच्छा फ़र्ज़ तो बरखा दत्त, राणा अयूब और आरिफा खान शेरवानी जैसी महिला पत्रकारों ने निभाया जो सभी खतरों को उठा कर सड़कों पर इनके हाळात की खबर दुनिया तक पहुंचाने निकलीं। गर्मी से चिलचिलाती सड़कों पर हज़ारों किलोमीटर लम्बा सफर तय किया। यह सब कुछ भी याद रखा जायेगा। जब मज़दूरों के इस लांग मार्च को दिशा देने की ज़रूरत के वक़्त इनके लीडर मीटिंगों के बहाने सुरक्षित कमरों में जा छुपे। मज़दूरों को जो सबक इस सारे घटनाक्रम ने दिया वह उन्हें साड़ी उम्र नारे सुन सुन कर नहीं मिला था। सबक सीखने वाला एक ऐतिहासिक वक़्त निकल गया। 
अब फिर मीटिंगों का दौर शुरू हो गया है लेकिन किसी ने मज़दूरों से क्षमा याचना भी नहीं की कि हमने संकटकाल में आप लोगों को अकेला छोड़ दिया था। हमने उस बेहद नाज़ुक दौर में आप से पीठ कर ली थी। न जाने अब यह लोग किन संघर्षों की बातें कर रहे हैं। 
जिस तस्वीर को इस पोस्ट के साथ प्रकशित किया गया है उसे गांव कुनेक्शन ने स्क्रॉल  इन के हवाले से अप्रैल 2020 में प्रकाशित किया था। इसे लॉक डाउन के 32 दिन बाद क्लिक किया गया था। तस्वीरें देखें तो इससे कहीं ज़्यादा भयानक सीन उनमें ही हैं। मुख्यधारा का मीडिया तो ऑंखें मूंदे पड़ा रहा लेकिन इसके बावजूद जन मीडिया से जुड़े लोगों ने अपने इस फ़र्ज़ को बहुत ही समर्पण भावना से निभाया। यह लोग जिनके पास न तो पैसे थे, न ही गाड़ियां और न ही प्रेस के कार्ड। यह लोग फिर भी मैदान में आ गए। इन लोगों ने हालात के उस  दृश्य को बहुत ही मेहनत से संभाला। शायद सही वक़्त आने पर इन अज्ञात लोगों की तरफ से संभाले गए आडियो वीडियो दस्तावेज़ समय की असली हकीकत को सामने लाएं। कोरोना की मुसीबत के समय इन लोगों के साथ हुआ बेहद निष्ठुर मज़ाक था यह। इस मज़ाक ने मज़दूरों की अनमोल जानें तो ली हैं लेकिन एक इतिहास भी रचा है। उन्हें बताया है कि उनका मार्गदर्शन करने अब न कोई लेनिन आएगा, न ही मार्क्स या माओ और न ही कोई अवतार या पीर पैगंबर। अब मज़दूरपन को खुद ही अपना लीडर बनना होगा।  
अंत में सुरजीत गग की एक पंजाबी कविता की कुछ पंक्तियों का पंजाबी अनुवाद; 
मैं तुम्हें श्रद्धा के सुमन 
भेंट करने से पहले 
अच्छी तरह हिलाडुला कर देखना चाहता हूं 
कहीं तू मरने का ड्रामा तो नहीं कर रहा?  
(नक्सली पत्रिका सुर्ख रेखा के कोरोना विशेषांक से साभार) 
इसी पत्रिका सुर्ख रेखा के इसी विशेषांक में सुरजीत गग की दूसरी भी इसी तरह ज़ोरदार प्रहार करती है:
अब तू खस्सी हो गया है 
"कामरेड"
तेरी आँखों में 
उत्तर आया है 
पूंजीवादी देशों की चकाचौंध का 
मोतिया। 
तुमने बोल बोल कर लिखवाया है 
चारो साहिबज़ादों से 
बे-दावा। 
इसी काव्य रचना के अंत में गग कहता है:
तेरे ड्राईंग रूम की 
दीवार का सिंगार बनने से पहले 
सचमुच पूजने योग्य होती थी 
तेरी घिसी हुई जुत्ती
और फटा हुआ कुरता!....... 

है तो और भी काफी कुछ लेकिन फिर किस अगली पोस्ट में। ऐसा लिखने में दिल का दर्द बढ़ जाता है लेकिन यह प्रयास आवश्यक भी लगता है। शायद किसी ईमानदार कामरेड के अंदर की आवाज़ जाग उठे! उसे समझ आ सके कि अब उसे लेनिन, मार्क्स और माओ को सीधे सीधे  करना होगा। वक़्त देख कर रंग बदलने वालों से मुक्ति अब सबसे अधिक आवश्यक हो गई है।    --मीडिया लिंक रविंद्र 

Tuesday, 7 January 2020

मुश्किल समस्याओं का मानवीय सॉल्यूशन खोजा जाना चाहिए

 इंस्टा पर आलिया भट्ट ने पढ़ने वालों को झंकझौरा 
सोशल मीडिया: 7 जनवरी 2020: (इंस्टाग्राम//जन मीडिया मंच)::
मामला सचमुच गड़बड़ाता जा रहा है। जब छात्र ही निशाना बन रहे हैं तो खतरा सचमुच बहुत गंभीर है। अफ़सोस कि ऐसे हालात में वे लोग सो रहे हैं जिन्हें जागना चाहिए था। सड़कों पर आना चाहिए थे। इस दहशतभरी चुप्पी के बावजूद जब मुख्य धारा का मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी से कन्नी कतराने लगा है उस   समय उन लोगों का खून खौला है जिनसे उम्मीद थी ही नहीं। वे लोग बोलने का फ़र्ज़ पूरा करने मैदान में आये हैं जिन को मस्ती भरी दुनिया के मस्त लोग ही समझा जाता था। 
ऐसे में आलिआ भट्ट ने हिम्मत दिखाई है। उसने कहा है "हर दिन मामला और डिस्टर्बिंग होता जा रहा है. चल क्या रहा है?"
उसने बहुत ही ज़्यादा हिम्मत दिखाते हुए कहा है, "जब स्टूडेंट, टीचर्स और शांतिपूर्ण तरीके से प्रोटेस्ट करने वाले लोग रेगुलर तरीके से शारीरिक हमले का शिकार होने लगते हैं, तब हमें ये दिखावा बंद कर देना चाहिए कि सब कुछ ठीक है। हमें सच्चाई का सामना करना चाहिए। हमें ये स्वीकार करना चाहिए कि हम गृह युद्ध में शामिल हो चुके हैं। इस देश के लोग हमारी विचारधाराओं से कितने भी अलग क्यों न हों, हमारी सभी मुश्किल समस्याओं का मानवीय सॉल्यूशन खोजा जाना चाहिए और उन शांतिपूर्ण और इनक्लूसिव (समावेशी) आदर्शों को मज़बूत करना चाहिए, जिन पर ये देश बना था। 
कोई भी विचारधारा जो हमें अलग करती हो, हम पर ज़ुल्म करती हो और हिंसा को बढ़ावा देने का प्रयास करती हो, उसका हमें मजबूती से विरोध करना चाहिए.”
आलिआ भट्ट ने इतिहास रचा है। हमेशां याद रखा जायेगा:
इस मौके पर याद आ रही हैं रेक्टर कथूरिया की एक काव्य रचना में से कुछ पंक्तियां:
कुछ लोग वक़्त पर निकले थे; 
कुछ लोग वक़्त पर बोले थे!
जब सब दरवाज़े बंद हुए 
दिल उन्होंने अपने खोले थे!       

यह पोस्ट आपको कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही। --मीडिया लिंक रविंद्र      

Thursday, 19 December 2019

जिसने अपनी सारी जवानी घुसपैठियों को निकालने में लगा दी

क्या कह रहे हैं वह--ज़रा ध्यान से सुनिए 
Himanshu Kumar के फेसबुक वाल से साभार उन्होंने इसे आज ही 19 दिसंबर 2019 को 3:18 पर पोस्ट किया 
'एनआरसी हमारी बहुत बड़ी गलती है'
गुवाहाटी से दीपक असीम, संजय वर्मा
जिस आदमी ने अपनी सारी जवानी घुसपैठियों को निकालने में लगा दी
जिस आदमी ने अपनी सारी जवानी आसाम से घुसपैठियों को निकालने की मुहिम में लगा दी हो और अंत में वही निराश होकर कहे कि हमने एक पागलपन में जिंदगी बर्बाद कर दी तो इसे आप क्या कहेंगे? यह आदमी हैं मृणाल तालुकदार, जो आसाम के जाने-माने पत्रकार हैं और एनआरसी पर इनकी लिखी किताब 'पोस्ट कोलोनियल आसाम का विमोचन' चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने हफ्ता भर पहले दिल्ली में किया है।इनकी दूसरी किताब,जिसका नाम है - 'एनआरसी का खेल' कुछ दिनों बाद आने वाली है।वह एनआरसी मामले में केंद्र सरकार को सलाह देने वाली कमेटी में भी नामित हैं।वे आल असम स्टूडेंट यूनियन (आसु) से जुड़े रहे। दस्तक के लिए उनसे लंबी और बहुत खुली चर्चा हुई।
उन्होंने कहा मेरी और मेरे जैसे हजारों लोगों की जवानी आसाम से घुसपैठियों को निकालने कि आंदोलन की भेंट चढ़ गई।हममें जोश था मगर होश नहीं था।पता नहीं था कि हम जिनको आसाम से बाहर निकालने के लिए आंदोलन कर रहे हैं उन्हें किस तरह पहचाना जाएगा और उन्हें बाहर करने की प्रक्रिया क्या होगी।1979 में हमारा आंदोलन शुरू हुआ और 1985 में हम ही आसाम की सरकार थे।प्रफुल्ल महंत हॉस्टल में रहते थे हॉस्टल से सीधे सीएम हाउस में रहने पहुंचे। 5 साल कैसे गुजर गए हमें पता ही नहीं चला।राजीव गांधी ने सही किया कि हमें चुनाव लड़ा कर सत्ता दिलवाई।सत्ता पाकर हमें एहसास हुआ कि सरकार के काम और मजबूरियां क्या होती हैं। अगला चुनाव हम हारे मगर 5 साल बाद फिर सत्ता में आए। इन दूसरे 5 सालों में भी हमें समझ नहीं आया कि बांग्लादेशियों को पहचानने की प्रक्रिया हो। लोग हमसे और हम अपने आप से निराश थे।मगर घुसपैठियों के खिलाफ हमारी मुहिम जारी थी। बहुत बाद में हमें इसकी प्रक्रिया सुझाई भारत के होम सेक्रेटरी रहे गोपाल कृष्ण पिल्लई ने।उन्होंने हमें समझाया कि आप सब की नागरिकता चेक कराओ। अपने आप की भी नागरिकता चेक कराओ और जो रह जाएं वह बाहरी।
मृणाल तालुकदार 
चोर को पकड़ने के लिए क्लास रूम में सभी की तलाशी लेने वाला यह आइडिया हमें खूब जँचा मगर तब नहीं मालूम था कि सवा तीन करोड़ लोग जब कागजों के लिए परेशान इधर-उधर भागेंगे तब क्या होगा? बाद में रंजन गोगोई ने कानूनी मदद की और खुद इसमें रुचि ली। इसमें आसाम के एक शख्स प्रदीप भुइँया की खास भूमिका रही। वे स्कूल के प्रिंसिपल हैं उन्होंने ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की और अपनी जेब से 60 लाख खर्च किए।बाद में उन्हीं की याचिका पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट एनआरसी के आदेश दिए एक और शख्स अभिजीत शर्मा ने भी एनआरसी के ड्राफ्ट को जारी कराने के लिए खूब भागदौड़ की।तो इस तरह एनआरसी वजूद में आया और वजूद में आते ही हम सब सोचने लगे कि यह हमने क्या कर डाला?
खुद हमारे घर के लोगों के नाम गलत हो गए।सोचिए कैसी बात है कि जो लोग घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए आंदोलन कर रहे हैं उन्हीं के घर वालों के नाम एनआरसी की लिस्ट में नहीं आएं? बहरहाल यह गलतियां बाद में दूर हुईं।
जानेमाने गांधीवादी समाजसेवी हिमांशु कुमार 
बयालीस हज़ार कर्मचारी 4 साल तक करोड़ों कागजों को जमा करते रहे और उनका वेरिफिकेशन चलता रहा।आसाम जैसे पागल हो गया था।एक एक कागज की पुष्टि के लिए दूसरे राज्य तक दौड़ लगानी पड़ती थी। जैसे किसी के दादा 1971 के पहले राजस्थान के किसी स्कूल में पढ़े तो उसे दादा का स्कूल सर्टिफिकेट लेने के लिए कई बार राजस्थान जाना पड़ा।लोगों ने लाखों रुपया खर्च किया। सैकड़ों लोगों ने दबाव में आत्महत्या कर ली।कितने ही लाइनों में लगकर मर ।कितनों को ही इस दबाव में अटैक आया दूसरी बीमारियां हुई। मैं कह नहीं सकता कि हमने अपने लोगों को कितनी तकलीफ दी। और फिर अंत में हासिल क्या हुआ? पहले चालीस लोग एनआरसी में नहीं आए। अब19 लाख लोग नहीं आ रहे हैं। चलिए मैं कहता हूं अंत में पांच लाख या तीन लाख लोग जाएंगे तो हम उनका क्या करेंगे? हमने यह सब पहले से नहीं सोचा था। हमें नहीं पता था कि यह समस्या इतनी ज्यादा मानवीय पहलुओं से जुड़ी हुई है। मुझे लगता है की हम इतने लोगों को ना वापस बांग्लादेश भेज सकेंगे न जेल में रख सकेंगे और ना ही इतने लोगों को ब्रह्मपुत्र में फेंका जा सकता है। तो अंत में यह निर्णय निकलेगा की वर्क परमिट दिया जाए और एनआरसी से पीछा छुड़ा लिया जाए। केंद्र सरकार दूसरे राज्यों में एनआरसी लाने की बात कर रही है लेकिन उसे आसाम का अनुभव हो चुका है।

Monday, 2 September 2019

आज के दौर में माल रोड से गुज़रते हुुुए...

जनता का दुख भूल चुके हैं, अपना रौब जमाते हैं।
पत्रकार भी देखो अब अपनी तस्वीर छपाते हैं।

जैसा इनके आका बोलें, वैसा पोज़ बनाते हैं।
कठपुतली की तरह वो इनसे नाच रोज़ नचवाते हैं।

कहते हैं बस एक ही भाषा, उसका दिवस मनाएंगे हम,
फिर भाषा के नाम पे देखो, ये नफरत फैलाते हैं।

इन चिंगारियों से ही था पंजाब जला यह भूल गए,
न जाने फिर उसी तरह की आग यह क्यों भड़काते हैं।

जब हिंदी पर पुती थी कालिख, तब न जाने कहां थे ये?
अब हिंदी के नाम पे देखो अपने नोट भुनाते हैं।

पत्रकारों पर भी देखो नेतागिरी का भूत चढ़ा,
बड़ी बड़ी तसवीरें अपनी, बैनर पर लगवाते हैं।

धर्म कलम का याद नही, बस मेकअप करते रहते हैं,
तरह तरह के पोज़ बना कर मॉडल से इतराते हैं।

गोद में बैठें, दौड़ लगी है, गोदी मीडिया का यह युग,
मैं भी चमचा, में भी चमचा, ज़ोर से यह चिल्लाते हैं।

पत्रकार का दायरा कितना बड़ा है, इनको पता नहीं,
अपने हाथों कूंए बना कर उनमें गिरते जाते हैं।

हर भाषा सम्मानजनक है, आओ यह संकल्प करें,
भाषा के जो नाम पर झगड़ें, वे सब मिटते जाते हैं।

संकट बहुत गंभीर खड़े हैं, आओ उनकी बात करें,
वो दुश्मन हैं जो संकट की बात भुलाते जाते हैं।

                          --रेक्टर कथूरिया,
                               लुधियाना