Saturday, 3 September 2022

निजीकरण की आंधी के खिलाफ डटे हुए हैं बैंक वाले

कार्पोरेटी दबदबे के बावजूद हो रहा है बैंक सम्मेलन 

पत्रकार सम्मेलन में बताया गया बैंक सम्मेलन का पूरा विवरण

लुधियाना: 3 सितंबर 2022: (एम एस भाटिया//इनपुट-कार्तिका सिंह//और जन मीडिया मंच डेस्क)::

धन की गंगा कहां से आ कर कहां चली जाती है?
यह सवाल दिन प्रति दिन गंभीर होता चला जा रहा है? पैसा आम आदमी की जेब से क्यूं उड़ कर निकल जाता है और क्यों बड़े धन्ना सेठों की तिजौरी में पहुंच  जाता है? क्यों उनकी अमीरी दुनिया भर में बताने लायक हो जाती है और क्यूं किसी आम आदमी को अपनी ख़ुदकुशी की बेबसी भी छुपानी पड़ती है। एक तरफ है कॉर्पोरेटी अटटहास--एक राक्षसी हंसी  अंदाज़ और दूसरी तरफ हैं गरीबी के आंसू? इस असुरी हंसी और आंसुओं के दरम्यान टकराव के आसार बढ़ते ही जा रहे हैं। 

तस्वीरें ग्लोबल भारत की वीडियो से साभार 
रविवार और सोमवार अर्थात  चार और पांच सितंबर को लुधियाना में हो रहा बैंक मुलाज़िमों का सम्मेलन 
इस तरह के कई सवालों को ले कर गंभीर है।  जिस महान देश की संस्कृति में खाना खाते वक्त अकेले हो कर खाना भी अकेले नहीं खाया जाता। पड़ोसी की रसोई  ध्यान रखा जाता है कि वहां भी भोजन बना था या नहीं? जिस देश में खाना खाते वक्त कुत्ते के हिस्से का निवाला निकाला जाता है, गाय के लिए रोटी निकाली जाती है, पक्षियों के लिए दाना निकाला जाता है वहां अब जनता के सभी निवाले कॉर्पोरेटी दानव निगलता जा रहा है। 

बहुत जल्द आने वाले हैं वे दिन जब कोई भूख का सताया राहगीर गन्ने के खेत से एक गन्ना भी नहीं तोड़ सकेगा। एक छल्ली भी नहीं तोड़ सकेगा। एक मूली या एक गाजर भी नहीं तोड़ सकेगा। ये सब बातें अतीत की बातें होने वाली हैं। अगर हम नहीं चेते तो हर सांस पर पहरा लगने वाली स्थिति बन रही है।

दूसरी तरफ कॉर्पोरेटी अमीरी पूरी तेज़ी से बढ़ रही है। दुनिया के तीसरे या चौथे सबसे अमीर और अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी ने अब देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई (State Bank of India) से 14,000 करोड़ रुपये का लोन मांगा है। कितना आसान धंधा हो गया है इन लोगों के लिए।  लोन लो अमीर बनो, कम्पनी खड़ी करो और  जाओ। 

बैंक सम्मेलन में आए लोग बहुत सी बातें बताते हैं जो अनहोनी जैसी लगती हैं लेकिन सच निकलती हैं। अब अडानी ग्रुप की गुजरात के मुंद्रा में पीवीसी प्लांट (PVC Plant) लगाने की योजना है। अब अडानी की परियोजना है तो ज़ाहिर है बड़ी ही होगी। इसके लिए पैसा भी बहुत चाहिए होगा। जुट भी जाएगा फिर भी सवाल तो है ही कि आखिर कहां आएगा? इसी प्रोजेक्ट की फाइनैसिंग करने के लिए अडानी समूह ने एसबीआई से लोन की मांग की है। उम्मीद है जल्द ही यह सब सिरे भी चढ़ जाएगा। कौन रोकेगा इतने बड़े घराने को? फिर कुछ नई कम्पनियां खड़ी हो जाएंगी तेज़ी से कुछ और पायदान ऊपर चढ़ते हुए अडानी साहिब जल्द ही दुनिया के सबसे अमीर बन जाएंगे। गरीब देश के अमीर लोगों की संख्या भी तो बढ़ती जा रही है। वह देश जहां लोग गरीबी, क़र्ज़ और भूख के कारण प्राकृतिक मौत मर जाते हैं या ख़ुदकुशी कर लेते हैं। 

बैंकों से जुड़े लोग मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले देते हुए बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट में शुरुआती निवेश के लिए 19,000 करोड़ रुपये की सख्त ज़रूरत है। किसी भी तरह की कोई कमी न रहे इस लिए अडानी समूह प्रोजेक्ट के लिए कर्ज और इक्विटी के जरिए पैसा जुटाने की योजना बना रही है। पैसा आ भी जाना ही है। अडानी समूह की होल्डिंग कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज (Adani Enterprises) के जरिए प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जा रहा है। इससे पहले भी मार्च में अडानी एंटरप्राइजेज की कंपनी नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट ने बैंकों से 12,770 करोड़ रुपये जुटाए थे। रकम तो यह भी बहुत बड़ी थी। हाल ही में कंपनी ने मुंद्रा में अपने ग्रीनफील्ड कॉपर रिफाइनरी प्रोजेक्ट के लिए 6,071 करोड़ रुपये जुटाए हैं। पीवीसी प्रोजेक्ट के लिए लोन पर अभी एसबीआई से बातचीत चल रही है। कितना दिमाग पाया है इन लोगों ने?कितनी  इन लोगों को?  किस तरह चुंबक की तरह पैसे को खींच लेते हैं। लोगों की जेब से भी और बैंकों से भी।  शायद लक्ष्मी किसी बैंकुंठ में नहीं बल्कि  इन्हीं के महलों में ही रहती है। 

यह सब भी उस हालत में जब कि इन लोगों पर पहले से ही बहुत से बकाए हैं। अडानी ग्रुप पर बैंकों का बड़ा कर्ज़ बकाया है। वित्त वर्ष 2021-22 में अडानी समूह पर कर्ज बढ़ गया है और 40.5 फीसदी बढ़कर 2.21 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। जबकि पिछले वित्त वर्ष 2020-21 में यह 1.57 लाख करोड़ रुपये था। वित्तीय वर्ष 2021-22 में अडानी एंटरप्राइजेज का कर्ज और बढ़ा है।  कंपनी का कर्ज बढ़कर 41,024 करोड़ रुपये पर जा पहुंचा है। किसी गरीब इंसान को कोई एक किलो आता उधर देने से मना कर देता है और इन लोगों को देखो कितनी बड़ी रकमें उधर में मिल जाती हैं। उधार भी ऐसा जिसे चुकाने की मजबूरी भी इनकी राह में नही आती। 

इसी बीच कामरेड स्क्रीन के मुताबिक आम इंसान सिर्फ दुखी है कि आखिर मेहनत करके भी उसका गुज़ारा क्यों नहीं होता। उसकी कमाई उसकी जेब में आने की बजाए किसकी जेब में चली जाती है। वह कभी कभी सवाल भी करता है कि बैंकों से कर्ज़े ले कर अंगूठा दिखा देने वाले लोग दुनिया के सबसे बड़े अमीरों  की सूची में कैसे आ जाते हैं। क्या कभी वह या उसकी औलाद अमीर बन भी पाएगी? इस तरह के बहुत से सव्वल आम जनता के मन में हैं लेकिन जवाब कोई नहीं देता। आज लुधियाना में बैंक वालों की प्रेस कांफ्रेंस थी। उनका दो दिवसीय सम्मेलन कल रविवार से लुधियाना के गुरु नानक भवन में शुरू हो रहा है। इसमें पहुंच रहे वक्ता प्रवक्ता उन सभी बारीकियों को बताएंगे कि आम इंसान गरीब कैसे होता जा रहा है और सत्ता  रहने वाले बड़े बड़े लोग दुनिया में बड़े अमीर कैसे होते जा रहे हैं। आज के पत्रकार सम्मेलन में आल  इंडिया बैंक इम्प्लाईज़ एसोसिएशन के महासचिव सी एच वेंकटचलन, सचिव बी इस राम बाबू और एक अन्य सचिव संजय कुमार भी मौजूद रहे। 

4  और 5 सितंबर 2022 को लुधियाना में आल इँडिया सेंट्रल बैंक इम्प्लाइज फैडरेशन और ऑल इँडिया सेंट्रल बैंकऑफिसर्स एसोसिएशन के संयुक्त सम्मेलन के अवसर पर खोले जाएंगे ऐसे रहस्य जो आपको हैरान कर देंगें। इन लोगों ने अपनी स्वतंत्रता से ही शुरू की। हम स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ की जय करते हैं: हम अपने बुजुर्गों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हाथों से लड़ने और स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए किए गए बलिदानों को तहे दिल से याद करते हैं। भारत ने पिछले 75 वर्षों में बहुत प्रगति की है और हमें उस पर गर्व भी है लेकिन साथ ही पूरी बेबाकी से बताया कि आज भी हमारा देश धन के असमान वितरण है। 

आज भी कुछ धनी लोगों के हाथों में बढ़ती जा रही है धन की एकाग्रता। आज भी  हमारे लोगों की एक बड़ी संख्या की गरीबी जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। जब हम इस खुशी के अवसर पर सभी को बधाई देते हैं, तो हम सभी के लिए एक बेहतर और समान समाज के लिए लड़ने का संकल्प भी लेते हैं।

बैंकों का निजीकरण न करें: 1969 में, भारत में प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। पिछले 53 वर्षों में, इन राष्ट्रीयकृत बैंकों ने हमारे देश के आर्थिक विकास में बहुत योगदान दिया है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में आम लोगों की सेवा के लिए हजारों शाखाएं खोली गई हैं। कृषि, लघु और मध्यम उद्योग, शिक्षा, प्रमुख उद्योग, ग्रामीण विकास, बुनियादी ढांचा क्षेत्र आदि को बड़े पैमाने पर ऋण दिया जा रहा है। इन बैंकों द्वारा जनता की बचत को उनकी बचत के लिए सुरक्षा प्रदान करने के लिए जुटाया गया है।

राष्ट्रीयकरण से पहले और 1969 के बाद भी निजी बैंकिंग की स्थिति बिगड़ती चली जा रही है। कई निजी बैंक कुप्रबंधन के कारण ध्वस्त हो गए हैं और लोगों की बचत खो गई है। राष्ट्रीयकृत बैंक लोगों की बचत की रक्षा कर रहे हैं। राष्ट्रीयकृत बैंक ही प्राथमिकता क्षेत्र को ऋण दे रहे हैं।

आज बैंकों की कुल जमाराशियां : रु. 170 लाख करोड़             दिया गया कुल ऋण : रु. 120 लाख करोड़

लोगों की सेवा के लिए इन राष्ट्रीयकृत बैंकों को और मजबूत करना होगा। लेकिन सरकार ने घोषणा की है कि राष्ट्रीयकृत बैंकों का निजीकरण किया जाएगा। यदि बैंकों का निजीकरण किया जाता है, तो ग्रामीण बैंकिंग प्रभावित होगी। निजी बैंक ग्रामीण बैंकिंग को बढ़ावा नहीं देंगे। वे अधिक लाभ में ही रुचि लेंगे। धीरे-धीरे केवल अमीर लोगों को ही खाते रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इसलिए एआईबीईए बैंकों के निजीकरण के फैसले का विरोध कर रहा है।

हम अपनी मांग का समर्थन करने के लिए लोगों को शिक्षित करने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान चला रहे हैं। हम प्रधानमंत्री को एक सामूहिक याचिका दायर करने के लिए लोगों से हस्ताक्षर एकत्र कर रहे हैं।

एआई.बी.ई.ए ने बड़ी कंपनियों से खराब ऋण की वसूली की मांग की: आज बैंकों में एकमात्र बड़ी समस्या बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा डिफ़ॉल्ट रूप से बढ़ते खराब ऋण हैं। हम उनके खिलाफ कर्ज की वसूली के लिए कार्रवाई की मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार उन्हें अधिक से अधिक रियायतें दे रही है।

पिछले 6 वर्षों से, खराब ऋण खातों को दिवाला और दिवालियापन संहिता IBC के तहत न्यायाधिकरणों को संदर्भित किया जाता है।कर्ज वसूली की जगह ये कर्ज कुछ अन्य कंपनियों को सस्ते दर पर बेचे जा रहे हैं जैसे दूकान की वस्तु बिका करती है इस सब कुछ से  और बैंकों को भारी नुकसान हुआ है।

आईबीसी जनता का पैसा लूटने का एक तरीका बन गया है क्योंकि बैंकों को इन सौदों में बड़े पैमाने पर (हेयर कट) घोर घाटे पड़ते   हैं और बलिदान देना पड़ता है। चूककर्ता बिना किसी दंडात्मक कार्रवाई के भाग जाते हैं। एक अन्य कॉर्पोरेट कंपनी सस्ते दरों पर इन ऋणों को ले रही है।

एनपीए-आईबीसी (हेयर कट) घाटे पढने की कहानी 

करोड़ों रु में

बैंकों के लिए    ऋण राशि                ऋण राशि का निपटान         और समाधान %         के पक्ष में

एस्सार                    54,000                    42,000                                       23%                    आर्सेलर मित्तल

भूषण स्टील्स         57,000                    35,000                                       38                        टाटा

ज्योति संरचनाएं       8,000                    3,600                                          55                          शरद संघ

डीएचएफएल         91,000                 37,000                                           60                         पीरामल

भूषण पावर               48,000                 19,000                                          60                        जेएसडब्ल्यू

इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स 14,000                   5,000                                            62                       वेदांत

मोनेट इस्पात         11,500                   2,800                                          75                        जेएसडब्ल्यू

एमटेक                     13,500                  2,700                                          80                         डीवीआईएल

आलोक इंडस्ट्रीज    30,000                  5,000                                           83                  रिलायंस + जेएम फिन

लैंको इंफ्रा              47,000                5,300                                              88                        कल्याण समूह

वीडियोकॉन            46,000               2,900                                             94                          वेदांत

एबीसी शिपयार्ड       22,000              1,200                                              95                          परिसमापन

शिवशंकरनीउद्योग     4,800                 320                                               95%                            ससुर

लाभ कहाँ जाता है: मार्च, 2022 तक - सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक

कुल सकल परिचालन लाभ: 208,654 करोड़

 खराब ऋण आदि के लिए प्रावधान: 1,41,918 करोड़

 प्रावधानों के बाद शुद्ध लाभ: 66,736 करोड़

इस प्रकार, बैंकों द्वारा अर्जित अधिकांश लाभ (लाभ का 68%) खराब ऋणों के प्रावधान और खराब ऋणों को बट्टे खाते में डालने के लिए चला जाता है। इस प्रकार कॉरपोरेट्स द्वारा लोगों का पैसा लूटा जा रहा है।

शाखाओं का बंद होना: जब सरकार समावेशी विकास और सभी लोगों की सेवा लेने की बात करती है, तो वास्तव में शाखाओं की संख्या साल दर साल कम होती जा रही है। हम मांग करते हैं कि अधिक से अधिक नई शाखाएं खोली जानी चाहिए, विशेष रूप से गैर-बैंकिंग क्षेत्रों में।

हम बैंकों के निजीकरण पर पनागरिया रिपोर्ट का विरोध करते हैं:

13-7-2022 को, श्री अरविंद पनागरिया, पूर्व नीति आयोग और नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के पूनम गुप्ता ने सभी बैंकों के निजीकरण का सुझाव देते हुए एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है क्योंकि निजी बैंक अधिक कुशल हैं। यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के खिलाफ प्रतिशोधात्मक और प्रतिशोधात्मक रिपोर्ट है।

वे पूरी तरह से भूल गए हैं कि हमारे देश में दक्षता और सरकार के कारण इतने सारे निजी बैंक ध्वस्त हो गए हैं। बैंकों को विलय करना पड़ा और उन्हें बचाना पड़ा।

वे भूल गए हैं कि 90% बैड लोन बड़ी निजी कॉरपोरेट कंपनियों के कारण हैं।

वे भूल गए हैं कि जन धन योजना के 98% खाते सरकार । बैंक द्वारा खोले गए हैं और निजी बैंकों द्वारा नहीं।

वे भूल गए हैं कि कृषि, रोजगार सृजन, गरीबी में कमी, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण आदि के लिए ऋण केवल सरकार बैंक द्वारा दिया जाता है। और निजी बैंक नहीं।

वे भूल गए हैं कि केवल पीएसबी ने दूरस्थ ग्रामीण गांवों में शाखाएं खोली हैं, निजी बैंकों ने नहीं।

आज भी प्राइवेट बैंकों में बहुत सारी छिपी हुई गड़बड़ियां हैं। निजी बैंकों का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड बिल्कुल भी अच्छा नहीं रहा है।

हम इस रिपोर्ट को खारिज करने की मांग करते हैं। सी.एच. वेंकटचलम, महासचिव ने बहुत ही सादगी से लेकिन स्पष्ट हो कर कहा। अब देखना है कि आम जनता कब इन बैंक वालों  का साथ देगी और कैसे देगी?

जन सरोकारों से जुड़ा मीडिया चलता रहे इसके लिए आप भी अपना कर्तव्य अवश्य निभाएं। अपनी तरफ से सहायता और सहयोग जारी रखें-

Sunday, 20 February 2022

पंजाब में आम जनता वंचित रही स्टेट ट्रांसपोर्ट की बसों से

पंजाब के हर डिपो से 50-50 फीसदी बसें इलेक्शन डियूटी पर लगा दीं 


लुधियाना
: 19 फरवरी 2022: (जन मीडिया मंच ब्यूरो):
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हम को जनता से क्या मतलब--वोटर जाएं भाड़ में! कुछ इसी तरह की भावना नेता लोगों की होती है चाहे वे किसी भी दल के क्यूं न हो। वे बस चुनावों के वक्त ही जनता को माईबाप कहने आते हैं लेकिन वास्तव में जनता को कभी कुछ नहीं समझते। इसी तरह का नज़ारा खरड़ के बस स्टैंड पर भी देखने को मिला। लोग घंटों से सड़कों पर बने हुए पंजाब के विभिन्न बस अड्डों पर भी खड़े थे लेकिन बसें नहीं आ रहीं थी। लुधियाना से जुड़े रूटों कुछ ज़्यादा ही बुरा हाल था।  लोग निजी बसों के कंडक्टरों की मिन्नतें कर रहे थे लेकिन वहां भी जगह नहीं थी। लोग छतों पर भी बैठे थे। खरड़ से लुधियाना जाने के लिए करीब पांच घंटे में केवल तीन सरकारी बसें इस बस स्टैन्ड से हो कर गुज़रीं। ये बसें भी चंडीगढ़//मोहाली इत्यादि पीछे से ही भर कर आईं थीं। दूसरी तरफ निजी कंपनियों की बसें धड़ाधड़ आ कर सवारियों को उठा रहीं थीं। सबसे ज़्यादा परेशानी हो रही थी महिला सवारियों को क्यूंकि राज्य सरकार की बसों में उनकी टिकट केवल आधार कार्ड दिखा कर मिल जाती हैं। लोग हैरान थे कि दस पंद्रह मिनटों की सर्विस के बाद आने वाली बसें आज कहाँ चलीं गईं। उन्हें ज़मीं निगल गई या आसमां खा गया। सवारियां एक दुसरे से पूछ रहीं थीं क्या आज इस रुट पर कोई हड़ताल है?

इस संबंध में पूछ-ताछ करने पर पता चला कि सरकार के कहने पर हर डीपू से 50 फीसदी बसें इलेक्शन डयूटी के लिए रवाना कर दी गईं  हैं।  लुधियाना की बसें पहले गिल गांव में एकत्र हुईं और उसके बाद उन्हें उनकी मंज़िलों की तरफ रवाना कर दिया गया। 

दूसरी तरफ अपनी अपनी मंज़िलों की तरफ अपने अपने काम के लिए जाने को मजबूर बेचारे आम लोग प्राइवेट बसों, वॉल्वो वाली महंगी बसों या फिर कैब/टेक्सी ले कर जाने को मजबूर हुए। जो यह सब एफोर्ड नहीं कर सके उन्हें बीएस स्टैंड पर देर तक धक्के खाने पड़े। इनमें से बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्होंने अपने अपने शहर जा कर अपना मतदान करना था लेकिन वे नहीं कर पाए। 

पंजाब के रूटों पर ये बसें इस लिए बेहद कम नज़र आईं क्यूंकि इन डिपुओं से 50-50 फीसदी बसें इलेक्शन डियूटी पर लगा दीं। इलेक्शन स्टाफ के लिए 19 और 20 फरवरी पूरे दो दिन ये सरकारी बसें आम जनता की निगाहों से दूर रहीं। लुधियाना डिपो से जुड़े रूटों पर हालत इस लिए यज़दा बिगड़ी क्यूंकि लुधियाना में न केवल एक डिपो है जबकि कुछ अन्य स्थानों पर तीन तीन डिपो भी हैं। मतदान के मौके पर भी आम जनता से सर्कार की ट्रांसपोर्ट सुविधा छीन लेने वाले लोग नई सुविधा क्या देंगें इसका अनुमान मुश्किल नहीं। 

Friday, 17 September 2021

किसान हितैषी होने का नाटक कर रहे हैं सुखबीर बादल-सरना

 17th September 2021 at 08:18 PM

सुखबीर बादल की नैया को डूबती हुई बताया हरविंदर सिंह सरना ने 

नई दिल्ली17 सितम्बर 2021: (मनप्रीत सिंह खालसा//जन मीडिया मंच)::

बादल पार्टी गुरुद्वारों के फंड को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए दुष्प्रयोग करना बंद करें। सुखबीर बादल एंड कंपनी को अपनी डूबती नैया दिख रही है। जिसको बचाने के लिए यह नेता किसान हितैषी होने का नाटक कर रहे है। उपयुक्त बातें, शिरोमणि अकाली दल दिल्ली के महासचिव और दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी के पूर्व प्रधान हरविंदर सिंह सरना ने कही। 

जानकारी हो कि, हरविंदर सिंह सरना ने अभी हाल ही में सम्पन्न डीएसजीएमसी चुनावों में मनजिंदर सिंह सिरसा को करारी शिकस्त दिया था। डीएसजीएमसी के नवनियुक्त सदस्य, सरना ने विरोधियों को आड़े हाथों लेते हुए यह बयान जारी करते हुए कहा कि "बादलों के प्रबंधन के नीचे लगातार सिख मर्यादाओं का उल्लंघन हो रहा है। केशगढ़ की घटना ने सबको झकझोर कर रख दिया है। जिसका जवाब संगत माँग रही है। एसजीपीसी और डीएसजीएमसी की हालात खस्ता है। भृष्टाचार चरम पर है। गुरूद्वारों के फंड को बादल अपने राजीतिक एजेंडे पर उड़ा रहे है। उनको किसान प्रदर्शन की आड़ में नाटक करने की जरूरत नही है। "

शिअद के महासचिव का मनना है कि सुखबीर बादल इन प्रदशर्न की आड़ में उनके खिलाफ लंबित गंभीर मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए कर रहे है। 

उन्होने कहा कि "एक समय था जब बड़े अकाली नेता सरदार हरचंद सिंह लोंगवाल के एक आह्वाहन पर, 265000 सिक्खो ने धर्म युद्ध मोर्चा में अपनी गिरफ्तारी दी थी। 1950 के दशक में, मास्टर तारा सिंह के आह्वाहन पर 50,000 से अधिक सिखो ने गिरफ्तारी दी थी। लेकिन आज अकाली का पवित्र नाम इन तथाकथित माफियाओं की वजह से धूमिल है। सिख पंथ को इन ढोंगियों की जरूरत नही है। हम अपना वर्तमान और भविष्य निर्धारित करने में पूर्ण सक्षम है।"

Wednesday, 9 September 2020

दमन रोको-आई एल ओ का बेलारूस को विशेष पत्र

Wednesday: 9th September 9 at 10:04 PM
 बेलारूस में चल रहे प्रदर्शनों के चलते हो रहा है वर्करों का दमन 
इस तस्वीर को क्लिक किया Natallia Rak ने
जेनेवा: 9 सितंबर 2020: (आई एल ओ न्यूज़//जन मीडिया मंच)::
इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाईजेशन के डायरेक्टर जनरल गुई राईडर (Guy Ryder) ने बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्सेंडर लुकाशेंको (Alexander Lukashenko) को लिखे एक पत्र में कहा है कि मानवाधिकारों के उलंघन को रोकें और वर्करों के लिए पूरा सम्मान सुनिश्चित करें। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि देश में वर्करों के रोष प्रदर्शनों की बाढ़ सी आई हुई है ऐसे में आवश्यक है कि उनकी स्वतंत्रता और उनके अधिकारों का विशेष ध्यान रखा जाये। अगर उनकी स्वतंत्रता और उनके अधिकारों का हनन होता है तो यह ठीक नहीं होगा। 
इस पत्र में उन्होंने छह ट्रेड यूनियनिस्टों पर लगाए गए आरोपों को वापिस लेने और उन्हें रिहा करने पर भी ज़ोर दिया है। यह लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन और इंडस्ट्रियल  शामिल हुए थे। 
उन्होंने अपने पत्र में राष्ट्रपति को याद दिलाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे वर्करों को हिंसा मुक्त माहौल देना  सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि वर्करों और प्रदर्शनकारियों पर कोई दबाव न डाला जाये और न ही उनको धमकियां दी जाएँ। अगर ऐसा कोई भी आरोप सामने आता है तो उसकी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच बिना किसी देरी के कराई जाये। 
गौरतलब है कि वर्करों के दमन की कई खबरें आई एल ओ को मिलीं थीं। 

Tuesday, 1 September 2020

मज़दूरों की तरफ पीठ करने वालों को भी मज़दूर याद रखेंगे

 वक़्त निकल जाने के बाद अब कौन से संघर्ष? 
गांव कुनेक्शन ने इस तस्वीर को स्क्रॉल  इन के हवाले से प्रकाशित किया है 
सब कुछ याद रखा जाएगा
ये उन मजदूरों के पांव है जो अपने बच्चों को गोदी में उठाएं सैकड़ों किलोमीटर पैदल चले। दूर दूर तक पैदल चले तांकि भूख से बचने के लिए अपने घर पहुंच सकें। वही गांव का घर जिसे वे लोग बरसों पहले छोड़  आये थे तांकि शहरों में जा  कमाई  कर सकें। अपने परिवारों पर चढ़े कर्ज़े उतार सकें। सड़कों पर घिसटते हुए यह वे लोग हैं जिन्हें संभालने की ज़िम्मेदारी सरकार भी पूरी न कर सकी इनके लीडर भी इनका साथ छोड़ गए। यह कहीं रेल से कट मरे और कहीं सड़क हादसों में लेकिन हर रोज़ इनके हाथ में झंडा पकड़ने वालों में से किसी ने इन्हें शहीद भी नहीं माना। 
अफ़सोस कि इनके साथ कंधा मिलाने के लिए वे लोग भी नहीं आये जो बरसों से नारे लगाते आ रहे हैं,"दुनिया भर के मज़दूरो एक हो जाओ।" 
अजीब इतफ़ाक़ है कि जब दुःख और संकट की घड़ी ने इन्हें एक हो कर सड़कों पर चलने को मजबूर कर दिया तो इनके रहनुमा कहलाने वाले लोग अपनी एयर कंडीशंड कोठियों में छुप गए कि कहीं कोरोना न देख ले। कहीं हमें कोरोना न डस ले।  मज़दूर शक्ति पर जिन लोगों को कभी नाज़ हुआ करता था उन्होंने यह भी न देखा कि अब मज़दूरों क्या हालत है? मज़दूरों को घर से बेघर हुआ देख कर भी इस तरफ से आंखें फेर ली गई। जिस वक़्त इंक़लाब को नज़दीक लाने का एक सुनहरी मौका दुश्मन  दिया था उस समय इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे बुलंद करने वाले खुद ही खामोश हो कर अपने अपने घरों में दुबक गए। 
इनके लीडरों से अच्छा फ़र्ज़ तो बरखा दत्त, राणा अयूब और आरिफा खान शेरवानी जैसी महिला पत्रकारों ने निभाया जो सभी खतरों को उठा कर सड़कों पर इनके हाळात की खबर दुनिया तक पहुंचाने निकलीं। गर्मी से चिलचिलाती सड़कों पर हज़ारों किलोमीटर लम्बा सफर तय किया। यह सब कुछ भी याद रखा जायेगा। जब मज़दूरों के इस लांग मार्च को दिशा देने की ज़रूरत के वक़्त इनके लीडर मीटिंगों के बहाने सुरक्षित कमरों में जा छुपे। मज़दूरों को जो सबक इस सारे घटनाक्रम ने दिया वह उन्हें साड़ी उम्र नारे सुन सुन कर नहीं मिला था। सबक सीखने वाला एक ऐतिहासिक वक़्त निकल गया। 
अब फिर मीटिंगों का दौर शुरू हो गया है लेकिन किसी ने मज़दूरों से क्षमा याचना भी नहीं की कि हमने संकटकाल में आप लोगों को अकेला छोड़ दिया था। हमने उस बेहद नाज़ुक दौर में आप से पीठ कर ली थी। न जाने अब यह लोग किन संघर्षों की बातें कर रहे हैं। 
जिस तस्वीर को इस पोस्ट के साथ प्रकशित किया गया है उसे गांव कुनेक्शन ने स्क्रॉल  इन के हवाले से अप्रैल 2020 में प्रकाशित किया था। इसे लॉक डाउन के 32 दिन बाद क्लिक किया गया था। तस्वीरें देखें तो इससे कहीं ज़्यादा भयानक सीन उनमें ही हैं। मुख्यधारा का मीडिया तो ऑंखें मूंदे पड़ा रहा लेकिन इसके बावजूद जन मीडिया से जुड़े लोगों ने अपने इस फ़र्ज़ को बहुत ही समर्पण भावना से निभाया। यह लोग जिनके पास न तो पैसे थे, न ही गाड़ियां और न ही प्रेस के कार्ड। यह लोग फिर भी मैदान में आ गए। इन लोगों ने हालात के उस  दृश्य को बहुत ही मेहनत से संभाला। शायद सही वक़्त आने पर इन अज्ञात लोगों की तरफ से संभाले गए आडियो वीडियो दस्तावेज़ समय की असली हकीकत को सामने लाएं। कोरोना की मुसीबत के समय इन लोगों के साथ हुआ बेहद निष्ठुर मज़ाक था यह। इस मज़ाक ने मज़दूरों की अनमोल जानें तो ली हैं लेकिन एक इतिहास भी रचा है। उन्हें बताया है कि उनका मार्गदर्शन करने अब न कोई लेनिन आएगा, न ही मार्क्स या माओ और न ही कोई अवतार या पीर पैगंबर। अब मज़दूरपन को खुद ही अपना लीडर बनना होगा।  
अंत में सुरजीत गग की एक पंजाबी कविता की कुछ पंक्तियों का पंजाबी अनुवाद; 
मैं तुम्हें श्रद्धा के सुमन 
भेंट करने से पहले 
अच्छी तरह हिलाडुला कर देखना चाहता हूं 
कहीं तू मरने का ड्रामा तो नहीं कर रहा?  
(नक्सली पत्रिका सुर्ख रेखा के कोरोना विशेषांक से साभार) 
इसी पत्रिका सुर्ख रेखा के इसी विशेषांक में सुरजीत गग की दूसरी भी इसी तरह ज़ोरदार प्रहार करती है:
अब तू खस्सी हो गया है 
"कामरेड"
तेरी आँखों में 
उत्तर आया है 
पूंजीवादी देशों की चकाचौंध का 
मोतिया। 
तुमने बोल बोल कर लिखवाया है 
चारो साहिबज़ादों से 
बे-दावा। 
इसी काव्य रचना के अंत में गग कहता है:
तेरे ड्राईंग रूम की 
दीवार का सिंगार बनने से पहले 
सचमुच पूजने योग्य होती थी 
तेरी घिसी हुई जुत्ती
और फटा हुआ कुरता!....... 

है तो और भी काफी कुछ लेकिन फिर किस अगली पोस्ट में। ऐसा लिखने में दिल का दर्द बढ़ जाता है लेकिन यह प्रयास आवश्यक भी लगता है। शायद किसी ईमानदार कामरेड के अंदर की आवाज़ जाग उठे! उसे समझ आ सके कि अब उसे लेनिन, मार्क्स और माओ को सीधे सीधे  करना होगा। वक़्त देख कर रंग बदलने वालों से मुक्ति अब सबसे अधिक आवश्यक हो गई है।    --मीडिया लिंक रविंद्र 

Tuesday, 7 January 2020

मुश्किल समस्याओं का मानवीय सॉल्यूशन खोजा जाना चाहिए

 इंस्टा पर आलिया भट्ट ने पढ़ने वालों को झंकझौरा 
सोशल मीडिया: 7 जनवरी 2020: (इंस्टाग्राम//जन मीडिया मंच)::
मामला सचमुच गड़बड़ाता जा रहा है। जब छात्र ही निशाना बन रहे हैं तो खतरा सचमुच बहुत गंभीर है। अफ़सोस कि ऐसे हालात में वे लोग सो रहे हैं जिन्हें जागना चाहिए था। सड़कों पर आना चाहिए थे। इस दहशतभरी चुप्पी के बावजूद जब मुख्य धारा का मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी से कन्नी कतराने लगा है उस   समय उन लोगों का खून खौला है जिनसे उम्मीद थी ही नहीं। वे लोग बोलने का फ़र्ज़ पूरा करने मैदान में आये हैं जिन को मस्ती भरी दुनिया के मस्त लोग ही समझा जाता था। 
ऐसे में आलिआ भट्ट ने हिम्मत दिखाई है। उसने कहा है "हर दिन मामला और डिस्टर्बिंग होता जा रहा है. चल क्या रहा है?"
उसने बहुत ही ज़्यादा हिम्मत दिखाते हुए कहा है, "जब स्टूडेंट, टीचर्स और शांतिपूर्ण तरीके से प्रोटेस्ट करने वाले लोग रेगुलर तरीके से शारीरिक हमले का शिकार होने लगते हैं, तब हमें ये दिखावा बंद कर देना चाहिए कि सब कुछ ठीक है। हमें सच्चाई का सामना करना चाहिए। हमें ये स्वीकार करना चाहिए कि हम गृह युद्ध में शामिल हो चुके हैं। इस देश के लोग हमारी विचारधाराओं से कितने भी अलग क्यों न हों, हमारी सभी मुश्किल समस्याओं का मानवीय सॉल्यूशन खोजा जाना चाहिए और उन शांतिपूर्ण और इनक्लूसिव (समावेशी) आदर्शों को मज़बूत करना चाहिए, जिन पर ये देश बना था। 
कोई भी विचारधारा जो हमें अलग करती हो, हम पर ज़ुल्म करती हो और हिंसा को बढ़ावा देने का प्रयास करती हो, उसका हमें मजबूती से विरोध करना चाहिए.”
आलिआ भट्ट ने इतिहास रचा है। हमेशां याद रखा जायेगा:
इस मौके पर याद आ रही हैं रेक्टर कथूरिया की एक काव्य रचना में से कुछ पंक्तियां:
कुछ लोग वक़्त पर निकले थे; 
कुछ लोग वक़्त पर बोले थे!
जब सब दरवाज़े बंद हुए 
दिल उन्होंने अपने खोले थे!       

यह पोस्ट आपको कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही। --मीडिया लिंक रविंद्र      

Thursday, 19 December 2019

जिसने अपनी सारी जवानी घुसपैठियों को निकालने में लगा दी

क्या कह रहे हैं वह--ज़रा ध्यान से सुनिए 
Himanshu Kumar के फेसबुक वाल से साभार उन्होंने इसे आज ही 19 दिसंबर 2019 को 3:18 पर पोस्ट किया 
'एनआरसी हमारी बहुत बड़ी गलती है'
गुवाहाटी से दीपक असीम, संजय वर्मा
जिस आदमी ने अपनी सारी जवानी घुसपैठियों को निकालने में लगा दी
जिस आदमी ने अपनी सारी जवानी आसाम से घुसपैठियों को निकालने की मुहिम में लगा दी हो और अंत में वही निराश होकर कहे कि हमने एक पागलपन में जिंदगी बर्बाद कर दी तो इसे आप क्या कहेंगे? यह आदमी हैं मृणाल तालुकदार, जो आसाम के जाने-माने पत्रकार हैं और एनआरसी पर इनकी लिखी किताब 'पोस्ट कोलोनियल आसाम का विमोचन' चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने हफ्ता भर पहले दिल्ली में किया है।इनकी दूसरी किताब,जिसका नाम है - 'एनआरसी का खेल' कुछ दिनों बाद आने वाली है।वह एनआरसी मामले में केंद्र सरकार को सलाह देने वाली कमेटी में भी नामित हैं।वे आल असम स्टूडेंट यूनियन (आसु) से जुड़े रहे। दस्तक के लिए उनसे लंबी और बहुत खुली चर्चा हुई।
उन्होंने कहा मेरी और मेरे जैसे हजारों लोगों की जवानी आसाम से घुसपैठियों को निकालने कि आंदोलन की भेंट चढ़ गई।हममें जोश था मगर होश नहीं था।पता नहीं था कि हम जिनको आसाम से बाहर निकालने के लिए आंदोलन कर रहे हैं उन्हें किस तरह पहचाना जाएगा और उन्हें बाहर करने की प्रक्रिया क्या होगी।1979 में हमारा आंदोलन शुरू हुआ और 1985 में हम ही आसाम की सरकार थे।प्रफुल्ल महंत हॉस्टल में रहते थे हॉस्टल से सीधे सीएम हाउस में रहने पहुंचे। 5 साल कैसे गुजर गए हमें पता ही नहीं चला।राजीव गांधी ने सही किया कि हमें चुनाव लड़ा कर सत्ता दिलवाई।सत्ता पाकर हमें एहसास हुआ कि सरकार के काम और मजबूरियां क्या होती हैं। अगला चुनाव हम हारे मगर 5 साल बाद फिर सत्ता में आए। इन दूसरे 5 सालों में भी हमें समझ नहीं आया कि बांग्लादेशियों को पहचानने की प्रक्रिया हो। लोग हमसे और हम अपने आप से निराश थे।मगर घुसपैठियों के खिलाफ हमारी मुहिम जारी थी। बहुत बाद में हमें इसकी प्रक्रिया सुझाई भारत के होम सेक्रेटरी रहे गोपाल कृष्ण पिल्लई ने।उन्होंने हमें समझाया कि आप सब की नागरिकता चेक कराओ। अपने आप की भी नागरिकता चेक कराओ और जो रह जाएं वह बाहरी।
मृणाल तालुकदार 
चोर को पकड़ने के लिए क्लास रूम में सभी की तलाशी लेने वाला यह आइडिया हमें खूब जँचा मगर तब नहीं मालूम था कि सवा तीन करोड़ लोग जब कागजों के लिए परेशान इधर-उधर भागेंगे तब क्या होगा? बाद में रंजन गोगोई ने कानूनी मदद की और खुद इसमें रुचि ली। इसमें आसाम के एक शख्स प्रदीप भुइँया की खास भूमिका रही। वे स्कूल के प्रिंसिपल हैं उन्होंने ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की और अपनी जेब से 60 लाख खर्च किए।बाद में उन्हीं की याचिका पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट एनआरसी के आदेश दिए एक और शख्स अभिजीत शर्मा ने भी एनआरसी के ड्राफ्ट को जारी कराने के लिए खूब भागदौड़ की।तो इस तरह एनआरसी वजूद में आया और वजूद में आते ही हम सब सोचने लगे कि यह हमने क्या कर डाला?
खुद हमारे घर के लोगों के नाम गलत हो गए।सोचिए कैसी बात है कि जो लोग घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए आंदोलन कर रहे हैं उन्हीं के घर वालों के नाम एनआरसी की लिस्ट में नहीं आएं? बहरहाल यह गलतियां बाद में दूर हुईं।
जानेमाने गांधीवादी समाजसेवी हिमांशु कुमार 
बयालीस हज़ार कर्मचारी 4 साल तक करोड़ों कागजों को जमा करते रहे और उनका वेरिफिकेशन चलता रहा।आसाम जैसे पागल हो गया था।एक एक कागज की पुष्टि के लिए दूसरे राज्य तक दौड़ लगानी पड़ती थी। जैसे किसी के दादा 1971 के पहले राजस्थान के किसी स्कूल में पढ़े तो उसे दादा का स्कूल सर्टिफिकेट लेने के लिए कई बार राजस्थान जाना पड़ा।लोगों ने लाखों रुपया खर्च किया। सैकड़ों लोगों ने दबाव में आत्महत्या कर ली।कितने ही लाइनों में लगकर मर ।कितनों को ही इस दबाव में अटैक आया दूसरी बीमारियां हुई। मैं कह नहीं सकता कि हमने अपने लोगों को कितनी तकलीफ दी। और फिर अंत में हासिल क्या हुआ? पहले चालीस लोग एनआरसी में नहीं आए। अब19 लाख लोग नहीं आ रहे हैं। चलिए मैं कहता हूं अंत में पांच लाख या तीन लाख लोग जाएंगे तो हम उनका क्या करेंगे? हमने यह सब पहले से नहीं सोचा था। हमें नहीं पता था कि यह समस्या इतनी ज्यादा मानवीय पहलुओं से जुड़ी हुई है। मुझे लगता है की हम इतने लोगों को ना वापस बांग्लादेश भेज सकेंगे न जेल में रख सकेंगे और ना ही इतने लोगों को ब्रह्मपुत्र में फेंका जा सकता है। तो अंत में यह निर्णय निकलेगा की वर्क परमिट दिया जाए और एनआरसी से पीछा छुड़ा लिया जाए। केंद्र सरकार दूसरे राज्यों में एनआरसी लाने की बात कर रही है लेकिन उसे आसाम का अनुभव हो चुका है।